क्या गंभीर की ‘ज़िद’ पड़ रही भारी! आखिर घरेलू जमीन पर क्यों हो रहा भारत का सूपड़ा साफ?
भारत की घरेलू टेस्ट हार ने टीम मैनेजमेंट की बड़ी कमजोरियां उजागर की हैं
न्यूज़ीलैंड से 3-0 की हार के बाद अब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ घर में 2-0 की टेस्ट सीरीज़ हार ने भारतीय टीम की तैयारी और सोच पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। कभी भारत को घर में हराना विदेशी टीमों का सपना हुआ करता था, लेकिन अब दो कमजोर टीमों ने ही भारत का सूपड़ा साफ कर दिया।

पहले न्यूज़ीलैंड बिना अपने स्टार खिलाड़ी केन विलियमसन के और फिर दक्षिण अफ्रीका बिना कागिसो रबाडा के आकर भारत को हरा गए। यह हार इसलिए भी सवाल खड़े कर रही है क्योंकि भारत ने दोनों मैचों में मुकाबला भी ठीक से नहीं किया। दूसरे टेस्ट में 408 रन से हार ने यह साफ कर दिया कि टीम में लड़ने का जोश कम दिखाई दे रहा है।
टीम मैनेजमेंट की सोच को लेकर सवाल
सबसे बड़ा सवाल टीम मैनेजमेंट की सोच को लेकर है। कोच गौतम गंभीर ने कोलकाता में ऐसी पिच बनवाई जो चार स्पिनरों वाली टीम के लिए भी ठीक नहीं थी। जब बल्लेबाज़ी पहले ही कमजोर दिख रही थी, तब ऐसी पिच पर खेलना और भी जोखिम भरा था। इससे लगा कि टीम की जरूरत और पिच की स्थिति के बीच तालमेल बिल्कुल नहीं है।
इसके अलावा टीम चयन भी काफी उलझा हुआ लगा। पहले टेस्ट में शानदार खेल दिखाने वाले अक्षर पटेल को बाहर कर दिया गया और चोट से लौटे नितीश रेड्डी को मौका दिया गया। घरेलू क्रिकेट में लगातार खेलने का नियम केवल बड़े खिलाड़ियों पर नहीं, बल्कि युवाओं पर भी लागू होना चाहिए, पर ऐसा नहीं हुआ।
खिलाड़ियों ने किया निराश
खिलाड़ियों की तकनीक और शॉट चयन भी इस हार की बड़ी वजह बनी। केएल राहुल का कमजोर फुटवर्क, यशस्वी जायसवाल की बेवजह कट शॉट की कोशिशें और कप्तान ऋषभ पंत का तेज़ गेंदबाज़ों पर अनियंत्रित शॉट खेलना—ये सब दिखाते हैं कि बल्लेबाज़ दबाव से निपटने के लिए तैयार नहीं थे।
क्या गंभीर की जिद पड़ी भारी
कोच गंभीर की जिद भी टीम पर भारी पड़ी। कोलकाता की पिच, टीम चयन और युवा खिलाड़ियों पर भरोसा बिना सही तैयारी के दिखा। अगर टीम को ट्रांजिशन फेज में माना जा रहा है, तो और भी ज़रूरी था कि फैसले स्पष्ट सोच के साथ लिए जाएं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

कभी भारत में टेस्ट खेलना विदेशी खिलाड़ियों के लिए सबसे कठिन चुनौती माना जाता था। खिलाड़ी महीनों तक तैयारी करते थे, स्पिन और दबाव का मुकाबला करने के लिए खास कैंप लगते थे। लेकिन अब स्थिति इतनी बदल गई है कि सामान्य खिलाड़ी भी भारत में आकर बड़ी पारियां खेल रहे हैं। यह संकेत है कि भारत का घरेलू दबदबा अब पहले जैसा नहीं रह गया है — और इसे दोबारा पाने के लिए टीम को अपनी सोच और रणनीति दोनों में सुधार करना होगा।