दो दशक से भारत में रह रही महिला को बांग्लादेश भेजना पड़ा महंगा, अब सुप्रीम कोर्ट ने दिलाई राहत
मानवीय आधार पर दी गई अनुमति, 8 साल के बेटे संग बीरभूम में होगी रहने की व्यवस्था और मिलेगी पूरी मेडिकल सुविधा।

सुप्रीम कोर्ट ने बांग्लादेश से भारत निर्वासित की गई गर्भवती महिला सोनाली खातून और उसके आठ साल के बेटे को भारत में प्रवेश की अनुमति दे दी। कोर्ट ने इस मामले में महिला और बच्चे की सुरक्षा और स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने साफ कहा कि, महिला और बच्चे को उनके गृह जिले पश्चिम बंगाल के बीरभूम में लाया जाए, जहां उनके पिता रहते हैं।
क्या हैं पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई कर रही थी, जो कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने 26 सितंबर को यह आदेश दिया था कि केंद्र सरकार द्वारा सोनाली खातून और अन्य को बांग्लादेश भेजने का फैसला अवैध है। सुप्रीम कोर्ट ने अब मानवीय आधार पर महिला और उसके बच्चे को भारत में आने की अनुमति दी है और उन्हें हर संभव मेडिकल सहायता मुहैया कराने का आदेश दिया है।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सोनाली और उसके बेटे को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी और निगरानी में रखा जाएगा। उन्होंने साफ कहा कि सरकार का यह निर्णय केवल मानवीय आधार पर लिया गया है और इससे यह नहीं माना जाएगा कि महिला भारतीय नागरिक हैं। महिला के पिता ने कोर्ट से आग्रह किया कि उनकी बेटी और पोते को बांग्लादेश से वापस लाया जाए, ताकि वे परिवार के साथ रह सकें। उनके प्रतिनिधियों के रूप में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने कोर्ट को बताया कि महिला के पति समेत अन्य परिवार के सदस्य भी बांग्लादेश में हैं और उन्हें भी भारत वापस लाने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार इस पर आगे के निर्देश दे सकती है।
भारतीय नागरिकता
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह भी कहा कि यदि महिला यह साबित कर देती है कि वह भोदू शेख की पुत्री हैं, तो यह उसकी भारतीय नागरिकता की पुष्टि के लिए पर्याप्त होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला और उसके बच्चे को हर तरह की देखभाल, सुरक्षा और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया गया कि बीरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा महिला और बच्चे को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराई जाए।
अगली सुनवाई कब होगी
इस मामले में महिला और उसके परिवार के जीवन की कठिनाइयों का जिक्र भी किया गया। महिला के पिता ने आरोप लगाया कि दिल्ली के रोहिणी इलाके के सेक्टर 26 में पिछले दो दशकों से दिहाड़ी मजदूरी कर रहे इन परिवारों को पुलिस ने 18 जून को पकड़ा और बांग्लादेशी होने के शक में 27 जून को सीमा पार भेज दिया। इस कार्रवाई के बाद परिवार के सामने कई तरह की परेशानियां आ गईं। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह मामला गंभीरता से लिया और कहा कि मानवता और मानवीय आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर को निर्धारित की है। इस दौरान महिला और उसके परिवार की सुरक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि महिला और बच्चे के भारत में प्रवेश के दौरान उन्हें किसी भी तरह की असुविधा या खतरे का सामना नहीं करना पड़े। केंद्र और राज्य सरकार दोनों को सुनिश्चित करना होगा कि महिला को हर संभव सहायता मिले। इसके अलावा, महिला और उसके बच्चे की निगरानी के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रोटोकॉल को भी लागू किया जाएगा।
सोनाली खातून के पिता ने कहा
सोनाली खातून के पिता का कहना है कि उनकी बेटी और पोते की वापसी उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने अदालत से अपील की कि बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाए। पिता ने बताया कि बांग्लादेश में परिवार के कुछ सदस्य अभी भी अलग हैं और उनके लिए भी भारत में सुरक्षित वापसी का रास्ता खोजा जाना चाहिए।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुसार
इस पूरे मामले को लेकर केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि महिला और उसके बच्चे के भारत आने का निर्णय केवल मानवीय आधार पर लिया गया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि “यह कदम केवल महिला और बच्चे के जीवन और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर किया गया है, और इससे उनकी नागरिकता संबंधी स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि “महिला और बच्चे को भारत में लाने के बाद उन्हें उचित चिकित्सा और सुरक्षा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। बीरभूम जिले के अधिकारी जिम्मेदारी लेंगे कि महिला को सुरक्षित वातावरण मिले और बच्चे की शिक्षा और स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाए।”
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