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बूंद बूंद पानी के लिए तरसेगा पाकिस्तान ! तालिबान कुनार नदी पर बांध बनाकर कैसे रोकेगा पाक का पानी

अफगानिस्तान में तालिबान कुनार नदी पर बांध बनाने की मंजूरी, पाकिस्तान की जल आपूर्ति, खेती और ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराया खतरा

 तालिबान कुनार नदी

काबुल से एक बड़ा भू-राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने कुनार नदी पर कई जलविद्युत बांध बनाने का आदेश दिया है। यह वही नदी है जो अफगानिस्तान के हिंदू कुश पर्वतों से निकलकर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में बहती है। तालिबान के इस निर्णय से पाकिस्तान की जल आपूर्ति, सिंचाई व्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को झटका लग सकता है।

तालिबान के सर्वोच्च नेता मौलवी हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने इस परियोजना को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताते हुए इसे तुरंत शुरू करने का निर्देश दिया है। यह फैसला ऐसे वक्त आया है जब अफगानिस्तान–पाकिस्तान सीमाओं पर झड़पें तेज़ हुई हैं और दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हैं।

 

क्या है तालिबान की रणनीति

तालिबान सरकार ने सत्ता में वापसी के बाद से पानी और ऊर्जा को राष्ट्रीय शक्ति का स्रोत मान लिया है। उसने स्वदेशी हाइड्रोपावर पर ज़ोर देते हुए कई नई परियोजनाओं को मंजूरी दी है। अफगान जल और ऊर्जा मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार “अखुंदजादा ने कुनार नदी पर बांधों के निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।”

कुनार नदी लगभग 480 किलोमीटर लंबी है और अफगानिस्तान के पूर्वी प्रांतों से होकर पाकिस्तान की ओर बहती है। इस पर बांध बनने से अफगानिस्तान न केवल बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भर हो सकता है, बल्कि पड़ोसी देशों को ऊर्जा निर्यात करने की स्थिति में भी आ सकता है।

 

पाकिस्तान की चिंता – पानी से ‘सियासी सूखा’

पाकिस्तान के कृषि प्रधान क्षेत्रों, खासकर पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा, की सिंचाई कुनार और उसकी सहायक नदियों पर निर्भर है। अगर अफगानिस्तान इन पर नियंत्रण कर लेता है, तो पाकिस्तान की फसलें, जलाशय और ऊर्जा उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। चूंकि दोनों देशों के बीच कोई औपचारिक जल-बंटवारा समझौता नहीं है, इसलिए तालिबान की यह कार्रवाई पाकिस्तान के लिए और भी खतरनाक साबित हो सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति भविष्य में जल युद्ध जैसी परिस्थिति पैदा कर सकती है।

भारत और अफगानिस्तान का बढ़ता जल सहयोग

तालिबान के इस कदम के समानांतर, भारत और अफगानिस्तान के बीच जल और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग लगातार गहराता जा रहा है। हाल ही में अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्ताकी ने भारत का दौरा किया और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से मुलाकात की। दोनों नेताओं ने हाइड्रोपावर और सिंचाई परियोजनाओं पर चर्चा की। भारत ने पहले ही अफगानिस्तान में दो बड़ी जल परियोजनाओं में निवेश किया हैं। भारत अफगान मैत्री बांध (सलमा डैम) — हेरात प्रांत में बना यह बांध सिंचाई और बिजली उत्पादन दोनों के लिए उपयोगी है।

शहतूत बांध परियोजना काबुल के पास बन रहे इस डैम के लिए भारत ने 236 मिलियन डॉलर (लगभग 2,000 करोड़ रुपये) की मदद का वादा किया है। इसके बनने से 20 लाख से ज़्यादा लोगों को पीने का साफ पानी मिलेगा और लगभग 4,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई संभव होगी। इन परियोजनाओं से न सिर्फ अफगानिस्तान को लाभ होगा, बल्कि यह भारत की सॉफ्ट पावर और रणनीतिक मौजूदगी को भी मजबूती देगा।

 तालिबान कुनार नदी

 

चीन की भी क्षेत्र में दिलचस्पी

अगस्त 2024 में अफगान जल मंत्रालय ने खुलासा किया था कि एक चीनी ऊर्जा कंपनी ने कुनार नदी पर तीन जलविद्युत बांधों शाल, सागी और सरताक में निवेश की इच्छा जताई है। अगर यह निवेश साकार हुआ, तो अफगानिस्तान में चीन की उपस्थिति और गहरी होगी। पाकिस्तान को यह चिंता भी है कि चीन अगर अफगान जल ढांचे में सक्रिय हुआ, तो उसकी चीन–पाक आर्थिक गलियारा (CPEC) परियोजना की जल आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। यानी तालिबान के एक निर्णय ने तीन देशों अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत को सीधे जल संघर्ष की कगार पर ला दिया है।

 

भारत की सिंधु जल संधि के फैसले के बाद बढ़ी हलचल

भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को निलंबित करने की घोषणा के बाद पकिस्तान वैसे ही मुश्किल में है। भारत ने यह कदम पहलगाम में हुए पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादी हमले के बाद उठाया था, जिसमें 26 निर्दोष नागरिक मारे गए थे।

भारत के इस कदम से पाकिस्तान पर दबाव पहले से ही बढ़ा हुआ है, और अब तालिबान का कुनार प्रोजेक्ट उसकी जल-चिंताओं को कई गुना बढ़ा सकता है। क्योंकि पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था और फसल उत्पादन मुख्यत अफगानिस्तान से आने वाले पानी पर भी निर्भर है।

 तालिबान कुनार नदी

सिंधु जल संधि की पृष्ठभूमि – जल विवादों की जड़

साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इसके तहत छह नदियों को दो हिस्सों में बाँटा गया।

  • पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलज) भारत के हिस्से में आईं।
  • पश्चिमी नदियाँ (झेलम, चिनाब, सिंधु) पाकिस्तान को दी गईं।

भारत को पश्चिमी नदियों के पानी का सीमित उपयोग सिंचाई और हाइड्रोपावर के लिए करने की अनुमति दी गई थी। लेकिन हालिया आतंकी हमलों और पाकिस्तान की आक्रामक नीतियों के कारण भारत ने इस संधि को निलंबित करने का निर्णय लिया। अब तालिबान का कुनार बांध निर्माण उसी दिशा में एक नई जल-राजनीति को जन्म दे रहा है। जिसमें पाकिस्तान दोनों ओर से दबाव में आ गया है।

नया ‘जल-संतुलन’ और भारत के लिए अवसर

विशेषज्ञ मानते हैं कि अफगानिस्तान में बढ़ती जल परियोजनाएं भारत के लिए रणनीतिक अवसर भी ला सकती हैं। एक ओर, भारत अपने मैत्री बांध और शहतूत डैम जैसे प्रोजेक्ट्स के ज़रिए अफगानिस्तान में विश्वसनीय साझेदार बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ने से भारत की कूटनीतिक स्थिति मजबूत होती है।

भारत के लिए यह समय है कि वह अफगानिस्तान के जल प्रबंधन, ऊर्जा उत्पादन और कृषि में सहयोग बढ़ाए। ताकि दक्षिण एशिया में उसका प्रभाव और बढ़ जाए । वहीं पाकिस्तान के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार बन चुकी है। क्योंकि तालिबान अब पहले जैसे दोस्त नहीं, बल्कि जल-राजनीति के नए प्रतिद्वंद्वी बनकर उभर रहे हैं।

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Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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