महिला के अधिकार, नियम, अवधि, इमरान खान विवाद और इद्दत का मक़सद सब कुछ आसान भाषा में।

जब भी इस्लाम की बात होती है, तो कई शब्द ऐसे होते हैं जो बार-बार सुनने में आते हैं लेकिन उनके मतलब और व्याख्या अक्सर अस्पष्ट होती है । ऐसा ही एक शब्द है, “इद्दत”। आपने यह जरूर सुना होगा। कभी तलाक की खबरों में, कभी किसी पति की मौत के बाद, या हाल ही में इमरान खान और बुशरा बीबी के मामले में। इद्दत एक ऐसी अवधि है, जो मुस्लिम महिला को अपने पति से तलाक होने या पति की मौत होने के बाद पूरी करनी होती है। इसे आप इंतज़ार की अवधि भी कह सकते हैं। इस समय महिला दूसरी शादी नहीं कर सकती।
इद्दत क्यों जरूरी मानी जाती है?
इस्लामी कानून के अनुसार, इद्दत का सबसे बड़ा कारण यह सुनिश्चित करना होता है, कि अगर महिला गर्भवती है। तो बच्चे की वंशावली को लेकर किसी प्रकार की शंका न हो।
इद्दत कब से शुरू होती है?
इद्दत की अवधि तभी शुरू होती है जब साफ हो जाए जिसमें या तो पति की मौत हो जाए, या फिर तलाक पूरी तरह हो जाए। अगर पति की मौत हो जाए तो इद्दत, इस स्थिति में पत्नी को चार महीने और दस दिन तक इद्दत में रहना होता है। अगर पत्नी गर्भवती हो, तो चार महीने दस दिन नहीं बल्कि बच्चे के जन्म तक इंतज़ार करना पड़ता है।
अगर तलाक हो जाए तो इद्दत कितनी होती है?
तलाक के बाद महिला को तीन मासिक धर्म, पूरे होने तक इंतज़ार करना पड़ता है। और अगर इस दौरान वह गर्भवती है, तो फिर से इद्दत बच्चे के जन्म तक चलती है।
तलाक के दौरान
अगर एक महिला तलाक के बाद इद्दत पूरी कर ही रही हो, और उसी दौरान उसके पति की मौत हो जाए, तो नियम बदल जाते हैं। इस स्थिति में उसे फिर से चार महीने दस दिन की इद्दत करनी पड़ती है। और अगर वह गर्भवती हो, तो पहले की तरह समय बच्चे के जन्म पर खत्म होगा।
इद्दत के दौरान शादी के नियम
इद्दत खत्म होने से पहले महिला दूसरी शादी नहीं कर सकती। अगर शादी कर भी ले, तो सुन्नी मुसलमानों में इसे गलत लेकिन पूरी तरह अवैध नहीं माना जाता, जबकि शिया समुदाय में ऐसी शादी बिल्कुल मान्य नहीं होती।
इद्दत के दौरान महिला के अधिकार
इद्दत सिर्फ इंतज़ार नहीं है, बल्कि इस दौरान महिला कुछ अधिकारों की हक़दार भी होती है। इद्दत के दौरान पति पर पत्नी का खर्च उठाने की ज़िम्मेदारी रहती है। पत्नी मेहर की हक़दार होती है, चाहे तलाक हुआ हो या नहीं। अगर इद्दत के दौरान पति की मौत हो जाए, और तलाक पूरी तरह लागू न हुआ हो, तो पत्नी उसकी संपत्ति में हिस्सा पाने की हकदार होती है। यानि यह अवधि महिला की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इस दौरान महिला को बहुत साधारण ढंग से रहना होता है। वह सज-संवर नहीं सकती, मेकअप नहीं कर सकती, और चमकीले या आकर्षक कपड़े पहनने की अनुमति नहीं होती। साथ ही वह बेवजह से घर से बाहर भी नहीं जा सकती सिर्फ मजबूरी की स्थिति में। यह समय सदमे, दुःख और चिंतन के रूप में भी देखा जाता है, खासतौर पर पति की मृत्यु के बाद।
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