चुनाव खत्म, आरोप शुरू, महिला रोजगार योजना पर बिहार में नई सियासत!
मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं के खातों में भेजे गए 10,000 रुपये को लेकर एक राजनीतिक माहौल गरमाया

अब पछताए होत का, जब चिड़िया चुग गई खेत। यह कहावत इन दिनों बिहार की राजनीति पर फिट बैठती है। विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सत्ता पक्ष दमदार वापसी कर चुका है और विपक्ष अब सवाल उठा रहा है। सबसे ज्यादा विवाद मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं के खातों में भेजे गए 10,000 रुपये को लेकर है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने आचार संहिता लागू होने के बाद पैसा भेजकर चुनाव प्रभावित किया। वहीं सरकार का कहना है कि योजना पहले से स्वीकृत थी और इसके वितरण की तारीखें चुनाव से पहले ही घोषित थीं।
क्या था पूरा मामला?
चुनाव से ठीक पहले नीतीश सरकार ने लाखों महिलाओं के खाते में 10,000 रुपये ट्रांसफर किए। यह मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना का हिस्सा था। यह स्कीम पहले से ही मंज़ूर थी और फंड भी जारी हो चुका था। योजना का पूरा वितरण कैलेंडर चुनाव घोषित होने से पहले सार्वजनिक किया गया था।
लेकिन विवाद तब बढ़ा जब भुगतान आचार संहिता लागू होने के बाद भी जारी रहा। विपक्ष का आरोप है कि यह सीधा चुनावी फायदा लेने का प्रयास था।
क्या कहती है चुनाव आयोग की गाइडलाइन?
आचार संहिता लागू होने के बाद:
- कोई नई योजना शुरू नहीं की जा सकती
- पुरानी योजनाएँ जारी रह सकती हैं
- जब तक उनमें कोई बदलाव या नई घोषणा न मिले
सरकार का दावा है:
- योजना नई नहीं थी
- फंड पहले जारी हो चुका था
- वितरण की तारीखें पहले तय थीं
- इसलिए यह आचार संहिता का उल्लंघन नहीं
विपक्ष कहता है कि चुनाव के बीच सीधा कैश ट्रांसफर मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इसे रोका जाना चाहिए था।
चुनाव आयोग की चुप्पी
चुनाव आयोग ने न इसे रोका, न ही गलत कहा। आयोग की यही चुप्पी विवाद को और बढ़ा रही है।
विपक्ष की राजनीति—अब क्यों?
सबसे दिलचस्प बात यह है कि विपक्ष ने योजना को तब गंभीरता से नहीं लिया जब पैसा भेजना शुरू हुआ। नतीजे आने के बाद जब विपक्ष 35 सीटों पर सिमट गया, तब इस योजना को चुनावी मुद्दा बना दिया। विपक्ष अब इसे सुप्रीम कोर्ट ले जाने की तैयारी कर रहा है।
क्या सुप्रीम कोर्ट में मामला टिकेगा?
सुप्रीम कोर्ट में मामला तभी टिकेगा जब विपक्ष साबित कर पाए कि:
- योजना चुनाव ध्यान में रखकर लागू की गई
- आचार संहिता के दौरान जानबूझकर लाभ पहुँचाया गया
- और इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हुई
कानूनी वास्तविकता:
- योजना पुरानी थी
- फंड पहले जारी था
- कैलेंडर पहले घोषित था
- कोई नया लाभ नहीं दिया गया
इसलिए मामला अदालत में आसानी से साबित नहीं होगा।
अब आगे क्या?
चुनाव के नतीजों के बाद बिहार में सरकार गठन की तैयारी जोरों पर है। 20 नवंबर को पटना के गांधी मैदान में शपथ ग्रहण संभव है।
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