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‘लौंडा नाच’ क्यों खो रहा है अपनी पहचान! जानिए 19वीं सदी में क्यों हुआ ‘लौंडा नाच’ का जन्म ?

भिखारी ठाकुर

भिखारी ठाकुर के शब्द – “हम नाचते नहीं, हम समाज को आईना दिखाते हैं।”

कभी कला का उत्सव था – ‘लौंडा नाच’

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक परंपराओं में “लौंडा नाच” सिर्फ एक नाच नहीं है , बल्कि लोगों के जीवन और भावनाओं का हिस्सा है । ये वह दौर था जब गांव-गांव में मेले लगते थे, उत्सवों की रौनक बढ़ाने के लिए मंच सजते थे, और फिर आता था वह पल जब एक लौंडा स्टेज पर उतरता था। लहराता दुपट्टा, माथे पर बिंदी, हाथों में कंगन, और चेहरे पर मुस्कुराहट। भीड़ तालियां बजा उठती थी, बच्चे झूम उठते थे, और बुजुर्ग भी मुस्कराकर कहते थे। “देखो, अब आया असली मज़ा। “लौंडा नाच” असल में पुरुषों का वह नृत्य था, जिसमें वे स्त्रियों का वेश धारण कर लोकगीतों की धुनों पर नाचते थे।

इसमें ठुमरी, कजरी, दादरा और चैती जैसी पारंपरिक शैलियों का मेल देखने को मिलता है । नाच का मकसद था। मनोरंजन, उत्सव और लोकजीवन की सादगी का जश्न। एक वक्त था जब ‘लौंडा नाच’ बिहार की मिट्टी की पहचान था। लोकगीतों की धुन पर सजे मेले, तालियों की गूंज, और दर्शकों की भीड़। पर समय ने करवट बदली, और इस कला पर छा गया कलंक का साया। जानिए कैसे एक चमकता सांस्कृतिक रंग अब संघर्ष की कहानी बन गया है।

कैसे शुरू हुआ ‘लौंडा नाच’ का सिलसिला

इस परंपरा की शुरुआत 19वीं सदी में हुई। तब नाच-गाने का काम केवल तवायफें करती थीं । लेकिन उनकी महफिलें सिर्फ अमीरों, नवाबों और जमींदारों के लिए होती थीं। आम लोगों के पास न तो पैसा था और न ही उस दुनिया तक पहुंच। मगर मनोरंजन की चाह हर इंसान में होती है।

इसी चाह ने “लौंडा नाच” को जन्म दिया। जब समाज की निचली तबकों की महिलाएं मंच पर नहीं आ सकती थीं, तब उन्हीं समाजों के युवकों ने स्त्रियों का वेश धारण कर नाचना शुरू किया। यह उनकी रचनात्मकता और विद्रोह दोनों का प्रतीक था। उन्होंने कहा “हम भी नाचेंगे, हम भी गाएंगे, अपनी खुशी खुद बनाएंगे।” यही वह पल था, जब “लौंडा नाच” सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि सामाजिक अभिव्यक्ति बन गया।

लौंडा नाच के महान कलाकार

अगर “लौंडा नाच” की बात हो और “भिखारी ठाकुर” का नाम न लिया जाए, तो कहानी अधूरी रह जाती है। भिखारी ठाकुर, जिन्हें ‘बिहार का शेक्सपियर’ कहा गया, उन्होंने लौंडा नाच के मंच को समाज की आवाज़ बना दिया। उनके नाटकों में सामाजिक संदेश होते थे। दहेज, महिला अधिकार, गरीबी, और प्रवास की पीड़ा।

उनके साथ-साथ रसूल मियां और चाई ओझा जैसे कलाकारों ने भी इस परंपरा को ऊँचाई दी। रसूल मियां मुस्लिम समुदाय से थे, जबकि चाई ओझा एक ब्राह्मण परिवार से आए थे। इससे साफ है कि लौंडा नाच कभी किसी जाति या धर्म तक सीमित नहीं रहा। यह लोक की आत्मा थी, जो सबकी थी।

क्या हैं ? छकरबाजी

मिथिलांचल के इलाके में लौंडा नाच को “छकरबाजी” कहा जाता है। इसमें 12 से 19 साल तक के युवा लड़के भाग लेते हैं। इनकी सुंदरता, हावभाव और अभिनय दर्शकों को बांध लेते थे। ये युवा मंच पर उतरते तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। जहां लौंडा नाच में कभी-कभी अधेड़ उम्र के कलाकार भी होते थे, वहीं छकरबाजी पूरी तरह युवा ऊर्जा से भरी होती थी।

कला से कलंक तक का सफर

एक समय था जब गांव के बड़े-बड़े आयोजन लौंडा नाच के बिना अधूरे माने जाते थे। शादी-ब्याह, छठ पूजा, या मेलों में इसका खास स्थान था। लेकिन 2000 के बाद का दौर कुछ अलग रहा। ऑर्केस्ट्रा और सस्ती मनोरंजन पार्टियों के चलन ने लौंडा नाच की चमक फीकी कर दी। धीरे-धीरे मंच पर “अश्लीलता” और “गाने-बजाने की गंदी प्रतिस्पर्धा” का साया पड़ गया। कुछ कलाकारों ने लोकप्रियता के चक्कर में नाच को सस्ती हरकतों से जोड़ दिया, और बस, यहीं से शुरू हुई ‘लौंडा नाच’ की बदनामी।

समाज ने कला को नहीं, बल्कि उस पर लगे कलंक को देखना शुरू कर दिया। लोगों को लगने लगा कि ये नाच अश्लील है, और इसके कलाकार “ग़लत” हैं। मगर सच्चाई यह है कि लौंडा नाच का मूल उद्देश्य कभी भी अश्लीलता नहीं था। यह तो लोक मनोरंजन और सामाजिक व्यंग्य का सबसे जीवंत रूप था।

क्या लौंडा नाच के कलाकार समलैंगिक होते हैं?

यह सवाल अक्सर लोगों के दिमाग में आता है, और यह भ्रांति सबसे ज़्यादा नुकसानदायक साबित हुई है। लौंडा नाच में कलाकार महिलाओं का रूप धारण करते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे समलैंगिक हैं। जेंडर क्रॉसिंग इस कला का हिस्सा है। यह अभिनय का रूप है, न कि किसी की यौन पहचान का संकेत। कई कलाकार शादीशुदा हैं, परिवार वाले हैं, और समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीते हैं। समाज को इस भेद को समझने की ज़रूरत है।

कमाई घटने के साथ घटने लगी इज़्जत

आज लौंडा नाच कंपनियां उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं। जहां पहले एक नाच कंपनी के पास महीने में दर्जनों बुकिंग होती थीं, अब साल भर में मुश्किल से कुछ शो मिलते हैं। लोगों की रुचि बदल गई, समाज का रवैया सख्त हो गया, और कलाकारों की ज़िंदगी मुश्किल में पड़ गई। कई कलाकार अब मजदूरी या ऑर्केस्ट्रा में काम कर रहे हैं। कला जो कभी सम्मान का प्रतीक थी, अब जीविका के लिए संघर्ष का ज़रिया बन चुकी है।

क्या लौटेगा लौंडा नाच का स्वर्णयुग?

कला कभी मरती नहीं, वह बस समय के साथ रूप बदलती है। “लौंडा नाच” भी लौट सकता हैं। बशर्ते समाज उसे सम्मान की नज़र से देखे। जरूरत है, कि सरकार और सांस्कृतिक संस्थान इस लोककला को “हेरिटेज परफॉर्मेंस” के रूप में पहचान दें। गांवों में फिर से नाच-मेला लौटे, मंच सजे, और कलाकारों को वही तालियां मिलें जो कभी उनका हक थीं। इसे समझें, तो पाएंगे इसमें वही आत्मा है जो भिखारी ठाकुर के शब्दों में झलकती थी। “हम नाचते नहीं, हम समाज को आईना दिखाते हैं।”

Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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