क्या कहते हैं एग्जिट पोल्स के आंकड़े! बिहार में NDA की लहर या महागठबंधन की आएगी आंधी
बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे और आखिरी चरण का मतदान खत्म होते ही मंगलवार शाम एग्जिट पोल्स के नतीजे सामने आ गए हैं। 15 से ज्यादा एजेंसियों के पोल ऑफ पोल्स के मुताबिक बिहार में एक बार फिर एनडीए की सरकार बनती दिख रही है। 243 सीटों वाली विधानसभा में एनडीए को 150 से अधिक सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि महागठबंधन को सिर्फ 83 सीटों पर सिमटने की संभावना जताई जा रही है। बाकी 5 सीटें अन्य दलों के खाते में जा सकती हैं।
पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार एनडीए को बड़ा फायदा होता नजर आ रहा है। 2020 में एनडीए को 125 सीटें मिली थीं, जबकि महागठबंधन को 110 और अन्य को 8 सीटें मिली थीं। इस बार के एग्जिट पोल्स के अनुसार एनडीए को लगभग 29 सीटों का फायदा और महागठबंधन को 27 सीटों का नुकसान हो सकता है।

रिकॉर्ड मतदान के क्या हैं मायने
भाजपा को इस बार सबसे ज्यादा 75 सीटें मिलने का अनुमान है। कांग्रेस को 13 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। वहीं, प्रशांत किशोर की नई पार्टी ‘जन सुराज’ का असर नजर नहीं आ रहा है। सर्वे के मुताबिक जन सुराज को केवल 3 से 5 सीटें मिल सकती हैं। बिहार में इस बार दो चरणों में चुनाव हुए थे। पहले चरण में 121 सीटों पर 65% मतदान हुआ, जबकि दूसरे चरण में रिकॉर्ड 68.5% वोटिंग हुई। चुनाव परिणाम 14 नवंबर को घोषित होंगे।
पिछले कुछ वर्षों में बिहार में एग्जिट पोल्स का रिकॉर्ड बहुत भरोसेमंद नहीं रहा है। 2015 में ज्यादातर एग्जिट पोल्स ने एनडीए को बढ़त दी थी, लेकिन नतीजों में महागठबंधन को साफ बहुमत मिला था। वहीं 2020 में तस्वीर उलटी रही। तब कई सर्वे एजेंसियों ने महागठबंधन की जीत का अनुमान लगाया था, लेकिन एनडीए ने 125 सीटें जीतकर सरकार बना ली थी।
कई पोल का औसत लें तो इसके अनुसार इस बार भी एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है। इस सर्वे में एनडीए को 145 से 160 सीटें, महागठबंधन को 73 से 91 सीटें और अन्य दलों को 5 से 10 सीटें मिलने का अनुमान है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा को 72 से 82, जेडीयू को 59 से 68, एलजेपी को 4 से 5 और हम को 5 सीटें मिल सकती हैं। महागठबंधन की बात करें तो आरजेडी को 51 से 63 सीटें, कांग्रेस को 12 से 15, सीपीआईएमएल को 6 से 9, सीपीआई को 2, सीपीएम को 1 और वीआईपी को 0 से 1 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इस बार भी चुनावी गणित में एनडीए बढ़त बनाए हुए दिख रहा है, जबकि महागठबंधन पिछड़ता नजर आ रहा है।
अक्सर गलत साबित होते हैं एग्जिट पोल्स के आंकड़े
बिहार में एग्जिट पोल्स के आंकड़े अक्सर गलत साबित हुए हैं, और इसके कई कारण बताए जाते हैं। राज्य में जातीय समीकरण बहुत जटिल हैं, और छोटे सैंपल साइज के कारण सर्वे एजेंसियां सही अनुमान नहीं लगा पातीं। इसके अलावा बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर मतदान के तुरंत बाद बाहर लौट जाते हैं, जिससे उन्हें सर्वे में शामिल करना मुश्किल होता है।
‘साइलेंट वोटर्स’ का बड़ा प्रभाव
बिहार में ‘साइलेंट वोटर्स’ का भी बड़ा प्रभाव माना जाता है। यह वर्ग अपने वोटिंग निर्णय को खुलकर नहीं बताता, जिससे पोल एजेंसियों का आकलन बिगड़ जाता है। इसके साथ ही महिलाओं की भागीदारी भी अधिक होती है, लेकिन वे अक्सर अपना वोटिंग झुकाव बताने से बचती हैं। इसी वजह से एग्जिट पोल्स के अनुमान कई बार वास्तविक परिणामों से भिन्न निकलते हैं।

नीतीश कुमार इस बार भी एनडीए के मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। वे 2005 से लगातार बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं और अब तक 9 बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। एनडीए ने उन्हें आगे रखकर ओबीसी, सवर्ण और महिला वोटर के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है। भाजपा ने यह संदेश भी दिया है कि एनडीए में अब किसी तरह की टूटफूट की संभावना नहीं है। वहीं महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाकर नई पीढ़ी और बदलाव का चेहरा पेश किया है।
तेजस्वी ने युवा मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाले लोगों को आकर्षित करने की कोशिश की है। कांग्रेस और वाम दलों ने भी उनके नेतृत्व को स्वीकार किया है, जिससे गठबंधन में एकजुटता का संदेश जाता है। अब देखना यह होगा कि 14 नवंबर को नतीजे एग्जिट पोल्स को सही साबित करते हैं या फिर एक बार फिर इतिहास दोहराया जाता है।
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