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दरभंगा विधानसभा चुनाव 2025: भाजपा बनाम राजद, क्या संजय सरावगी बचा पाएंगे जीत का किला?

दरभंगा विधानसभा सीट पर भाजपा के संजय सरावगी लगातार तीन बार विजेता रहे हैं, लेकिन घटते अंतर ने मुकाबले को रोचक बना दिया है।

जानिए 2010 से 2020 तक का चुनावी इतिहास, जातीय समीकरण और 2025 की चुनौतियाँ।

दरभंगा। बिहार चुनावी सरगर्मी में दरभंगा विधानसभा सीट इस बार भी सुर्खियों में है। यह सीट मिथिलांचल इलाके की प्रमुख सीटों में गिनी जाती है और यहां का चुनाव जातीय समीकरण, उम्मीदवार की छवि और स्थानीय मुद्दों पर टिका रहता है। लंबे समय से यह सीट भाजपा के खाते में रही है और संजय सरावगी इसका चेहरा बने हुए हैं। लेकिन लगातार कड़े मुकाबलों और घटते-बढ़ते वोट अंतर ने भाजपा को सतर्क कर दिया है।

पिछले तीन चुनावों का हाल

दरभंगा सीट पर संजय सरावगी का दबदबा साफ दिखता है।

2010 का चुनाव – भाजपा प्रत्याशी संजय सरावगी ने राजद उम्मीदवार सुल्तान अहमद को भारी अंतर से हराकर जीत दर्ज की। उन्हें लगभग 54% वोट मिले और जीत का अंतर 20 हज़ार से ज्यादा रहा। यह जीत भाजपा-जदयू गठबंधन की मजबूती का प्रतीक बनी।

2015 का चुनाव – इस बार महागठबंधन की लहर में पूरे बिहार में भाजपा को झटका लगा। दरभंगा में भी राजद उम्मीदवार ओमप्रकाश खेड़िया ने कड़ी चुनौती दी। जीत का अंतर घटकर केवल 7,500 वोट रह गया। हालांकि, सरावगी ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की और अपनी पकड़ बनाए रखी।

2020 का चुनाव – भाजपा के संजय सरावगी का मुकाबला राजद के अमरनाथ गामी से हुआ। वोटिंग बेहद करीबी रही। भाजपा को लगभग 49% और राजद को करीब 43% वोट मिले। नतीजा यह रहा कि सरावगी ने लगातार तीसरी जीत दर्ज की, लेकिन जीत का अंतर महज 10,600 वोट रहा।

जातीय समीकरण

  • दरभंगा विधानसभा का चुनाव पूरी तरह जातीय और सामाजिक समीकरणों से प्रभावित रहता है।
  • ब्राह्मण और सवर्ण मतदाता (25–28%) – यह वर्ग भाजपा का स्थायी वोट बैंक माना जाता है और संजय सरावगी इसी पर सबसे अधिक निर्भर रहते हैं।
  • मुस्लिम मतदाता (18–20%) – इनकी संख्या काफी है और ये वोट परंपरागत रूप से राजद या महागठबंधन को जाते रहे हैं।
  • अनुसूचित जाति (SC – 15–16%) – इनका वोट किसी एक दल से स्थायी रूप से जुड़ा नहीं है और परिस्थितियों के आधार पर बंटता है।
  • ओबीसी और ईबीसी मतदाता – इनकी भी अच्छी संख्या है और कई बार चुनावी परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

यानी, ब्राह्मण और सवर्णों के ठोस समर्थन के दम पर भाजपा मजबूत रहती है, जबकि मुस्लिम और दलित वोट विपक्ष को बढ़त दिलाते हैं।

वोटिंग पैटर्न

  • पिछले तीन चुनावों का पैटर्न साफ करता है कि मुकाबला लगातार कड़ा होता गया है।
  • 2010 में भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की।
  • 2015 में महागठबंधन की लहर के बावजूद भाजपा ने सीट बचाई, लेकिन अंतर घट गया।
  • 2020 में जीत फिर मिली, लेकिन कांटे की टक्कर से।

मतलब, मतदाता भाजपा को लगातार मौका दे रहे हैं, लेकिन विपक्ष हर बार और मजबूत होकर सामने आ रहा है।

2025 का चुनाव : किसके लिए चुनौती, किसके लिए उम्मीद?

भाजपा – लगातार तीन जीत ने भाजपा को इस सीट पर मजबूत स्थिति में खड़ा किया है। लेकिन घटते अंतर को देखकर पार्टी को नए मतदाताओं, खासकर युवाओं और दलित वर्ग तक पहुँचना होगा।

राजद/महागठबंधन – लगातार दूसरे नंबर पर रहने वाली राजद की कोशिश होगी कि मुस्लिम और दलित वोट पूरी तरह एकजुट हों। अगर पिछड़े वर्ग के वोटों में भी सेंध लगी तो भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है।

अन्य दल – छोटे दलों का असर अब तक सीमित रहा है। लेकिन अगर कोई तीसरा मजबूत उम्मीदवार आया तो वोट बंट सकते हैं और नतीजों में उलटफेर हो सकता है।

 

मुद्दे और मतदाता

दरभंगा शहर की समस्याएँ चुनाव में अहम भूमिका निभाती हैं।

  • ट्रैफिक जाम और सड़क की समस्या – शहर की सबसे बड़ी परेशानी है।
  • सफाई और जलजमाव – बारिश के दिनों में जलजमाव और गंदगी बड़ा मुद्दा बनता है।
  • पानी-बिजली की किल्लत – शहरी मतदाता गर्मियों में इन समस्याओं को लेकर नाराज़ रहते हैं।
  • बेरोजगारी – युवा मतदाता नौकरी और रोजगार को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं

युवा और महिला मतदाता 2025 के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

 

दरभंगा विधानसभा पिछले तीन चुनावों से भाजपा का गढ़ बनी हुई है। संजय सरावगी की लगातार जीत इस बात का सबूत है। लेकिन जीत के अंतर का घटता-बढ़ता ग्राफ यह संकेत देता है कि मुकाबला और कड़ा हो रहा है। अब देखना यह है कि भाजपा अपनी पकड़ कायम रखती है या महागठबंधन यहां नया इतिहास लिखता है। इतना तय है कि दरभंगा का चुनाव इस बार बिहार की राजनीति में बड़ा असर डालेगा।

Shashwat Srijan

Content Writer

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