लखीसराय के चानन प्रखंड के चार गांवों के सैकड़ों मतदाता पहली बार अपने ही गांव में डालेंगे वोट, कभी डर का इलाका अब बन रहा लोकतंत्र का नया केंद्र

बदलते बिहार की एक नई तस्वीर सामने आई है। जिस जगह पर कभी बंदूक की आवाज़ गूंजती थी, वहां अब वोट की आवाज़ सुनाई देने वाली है। लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र के चानन प्रखंड के चार गांवों के लोगों के लिए यह चुनाव किसी त्योहार से कम नहीं है। कारण यह है कि 16 साल बाद वे पहली बार अपने ही गांव में वोट डाल पाएंगे।
ये जगहें कभी नक्सल प्रभाव के कारण चुनावी नक्शे से लगभग गायब सी हो गई थीं। लोग मतदान केंद्र तक पहुंचने के लिए जंगलों, पहाड़ों और पथरीली राहों से गुजरते थे। लेकिन अब, हालात बदल गए हैं। प्रशासन और सुरक्षा बलों की मेहनत ने यह मुमकिन कर दिखाया है कि लोकतंत्र की आवाज़ गांव की गलियों तक फिर लौट आए।
गांव में बने मतदान केंद्र
चानन प्रखंड के इन गांवों में 16 साल से मतदान केंद्र बाहर बनाए जाते थे। सुरक्षा कारणों से लोगों को छह से दस किलोमीटर तक पैदल चलकर वोट डालने जाना पड़ता था। जंगलों और पहाड़ी रास्तों से होकर जाना हर बार जोखिम भरा होता था। कई बार तो लोग जान के डर से मतदान करने ही नहीं निकलते थे।

पहली बार गांव में लगेगा ‘ ईवीएम ‘
इस बार चुनाव आयोग ने उन पांच मतदान केंद्रों को उनके मूल स्थान पर बहाल कर दिया है, जो पहले सुरक्षा कारणों से मैदान क्षेत्रों में स्थानांतरित कर दिए गए थे। इनमें कछुआ और बासकुंड गांव प्रमुख हैं। कछुआ के सामुदायिक भवन में बने मतदान केंद्र संख्या 407 पर 363 मतदाता हैं। इनमें 243 पुरुष और 252 महिलाएं शामिल हैं।
वहीं उत्क्रमित मध्य विद्यालय बासकुंड-कछुआ में बने मतदान केंद्र संख्या 417 पर 495 मतदाता हैं। इनमें 186 पुरुष और 177 महिलाएं हैं। गांव के लोग बताते हैं, कि यह सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि उनकी आज़ादी और आत्मसम्मान की वापसी जैसा है।
शांतिपूर्ण मतदान की तैयारी
नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती रहती है। इस बार प्रशासन ने इसे लेकर पुख्ता इंतज़ाम किए हैं। अर्धसैनिक बलों की निगरानी में मतदान केंद्रों पर मतदान होगा। चानन प्रखंड के 56 मतदान केंद्रों को नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है, लेकिन अब इन इलाकों में सुरक्षा और भरोसे दोनों का माहौल लौट रहा है।
लखीसराय जिला प्रशासन ने बताया कि गांवों में सुरक्षा बलों की लगातार गश्त चल रही है। अधिकारियों का कहना है कि अब गांवों में स्थिति सामान्य है और लोग बिना किसी डर के वोट डाल सकेंगे।
विकास की उम्मीद
इन गांवों में लोगों के चेहरे पर जो मुस्कान है, वह लंबे इंतज़ार और संघर्ष की कहानी कहती है। कभी यही गांव नक्सलियों का गढ़ माने जाते थे। शाम होते ही लोग घरों में बंद हो जाते थे। लेकिन धीरे-धीरे सुरक्षा बलों की मुहिम, प्रशासन की निगरानी और स्थानीय लोगों के सहयोग से हालात बदलने लगे। आज इन गांवों में सड़कों की मरम्मत हो रही है, स्कूलों में बच्चे पढ़ रहे हैं और अब वोट डालने की तैयारी चल रही है।
लोकतंत्र के उत्सव कई साल बाद
गांव के लोगों ने मतदान केंद्रों की सफाई खुद की है। जगह-जगह चौक-चौराहों पर झंडे और पोस्टर लगाए गए हैं। महिलाओं में भी भारी उत्साह है। उनका कहना है कि अब वे भी बिना किसी डर के वोट डालने जाएंगी। प्रशासन की ओर से भी मतदाताओं को प्रेरित करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। अधिकारी गांवों में जाकर बता रहे हैं कि हर वोट की कीमत होती है और यह बदलाव की शुरुआत है।