मोदी सरकार का ‘क्लीन इंडिया’ मिशन सिर्फ गंदगी हटाने तक सीमित नहीं रहा। चार साल की सफाई में सरकार ने कमाई, खाली हुई लाखों वर्ग फुट जमीन और देशभर में बदले शहरों के चेहरे।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में ‘स्वच्छ भारत मिशन’ की शुरुआत की थी, 2 अक्टूबर, गांधी जयंती के दिन शुरू हुआ यह मिशन अब एक राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है। नौ साल बाद इसका असर साफ दिखता है, सिर्फ सफाई नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक बदलाव के रूप में भी ।
केंद्र सरकार की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि पिछले चार साल में चलाए गए स्पेशल क्लीनिंग कैंपेन से सरकार ने लगभग 4085 करोड़ रुपये की कमाई की है। जी हां, जिस कूड़े और कबाड़ को कभी बोझ समझा जाता था, अब वही सरकार के लिए आमदनी का जरिया बन गया है। मंत्रालयों और सरकारी दफ्तरों से निकले पुराने रिकॉर्ड, कबाड़ के सामान, टूटी कुर्सियाँ, बेकार मशीनें—सबको व्यवस्थित तरीके से बेचा गया और इससे मोटी रकम जुटाई गई।
डिजिटल इंडिया
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के मुताबिक, 2021 से अब तक “स्पेशल कैंपेन 5.0” के तहत करीब 9.87 लाख जगहों पर सफाई अभियान चलाए गए। इस दौरान सरकारी विभागों की लगभग 53 लाख फाइलों की समीक्षा हुई। इनमें से 28 लाख से ज्यादा पुरानी कागज़ी फाइलों को डिजिटल में बदलकर न सिर्फ जगह बचाई गई बल्कि पुराने कागज़ को भी बेचकर राजस्व कमाया गया।
खाली स्थान का ऐसे हुआ उपयोग
इन अभियानों का असर सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं रहा। कई जगहों पर जहां सालों से कूड़ा पड़ा था, वहाँ अब हरियाली लौट आई है। सफाई के दौरान लगभग 231.75 लाख वर्ग फुट जमीन को कचरे से खाली कराया गया। अब इन जगहों का इस्तेमाल पार्क, ग्रीन ज़ोन या सामुदायिक स्पेस के रूप में किया जा रहा है।
देश के कई शहरों में “वेस्ट टू वंडर” पार्क बने
जहाँ पुराने लोहे और कबाड़ से सुंदर मूर्तियाँ, बेंच और कलाकृतियाँ बनाई गई हैं। दिल्ली, भोपाल, इंदौर, वाराणसी और सूरत जैसे शहरों में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ कचरे को कला में बदला गया है।
सिर्फ सफाई नहीं
स्वच्छ भारत मिशन का मकसद सिर्फ सफाई तक सीमित नहीं रहा। इसने कचरे के प्रबंधन और रीसाइक्लिंग की दिशा में भी बड़ी प्रगति की है। अब तक देशभर में 12 करोड़ से ज्यादा शौचालय बनाए जा चुके हैं, जिससे खुले में शौच से मुक्ति मिली है।
साथ ही, देश के अलग-अलग राज्यों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) पर काम हुआ है। पुराने 2492 लाख टन कचरे में से 1437 लाख टन का निपटारा किया जा चुका है। बचे हुए कचरे को भी ‘वेस्ट टू एनर्जी’ और ‘वेस्ट टू कंपोस्ट’ के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में काम चल रहा है।
जनता की भागीदारी
स्वच्छ भारत मिशन की सबसे बड़ी ताकत रही है। जनभागीदारी सरकार के मुताबिक, इस दौरान 7.3 लाख से ज्यादा शिकायतों का निपटारा किया गया है। लोगों ने सोशल मीडिया, हेल्पलाइन और मोबाइल ऐप के ज़रिए कचरे, सीवेज और सफाई से जुड़ी समस्याएँ दर्ज कराईं, जिनका समाधान स्थानीय निकायों ने किया। अब कई नगर निगमों ने ‘स्वच्छ ऐप’ और ‘स्वच्छ सर्वेक्षण’ जैसे डिजिटल टूल्स भी लॉन्च किए हैं, जिससे आम लोग सीधे सफाई अभियानों में भाग ले सकें।

शहरों का बदला चेहरा
अगर आप आज इंदौर, भोपाल, सूरत या वाराणसी जैसे शहरों की सड़कों पर निकलें, तो आपको फर्क साफ दिखेगा। ‘स्वच्छ सर्वेक्षण’ के नतीजों ने लोगों में प्रतियोगिता की भावना भी जगाई है। हर शहर अब स्वच्छता रैंकिंग में ऊपर आने की कोशिश कर रहा है।
स्वच्छ भारत मिशन के दूसरे चरण — SBM-Urban 2.0 और SBM-Gramin 2.0 — अब कचरे को पूरी तरह रीसायकल करने और हर घर को ठोस अपशिष्ट निस्तारण से जोड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं।
यह अभियान अब “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” से भी जुड़ चुका है। ‘कूड़े से कमाई’ का मॉडल छोटे शहरों और पंचायतों में रोजगार के नए अवसर खोल सकता है। प्लास्टिक वेस्ट रीसाइक्लिंग यूनिट, कंपोस्ट प्लांट और मटेरियल रिकवरी फैसिलिटीज़ से स्थानीय स्तर पर आमदनी और पर्यावरण दोनों को फायदा मिल रहा है। कई महिलाएं और स्व-सहायता समूह (SHGs) अब कचरे के प्रबंधन से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं। यह अभियान धीरे-धीरे एक सामाजिक क्रांति का रूप ले चुका है।