हाईकोर्ट ने निचली अदालत का पुराना आदेश रद्द किया, अब मुंबई हमले के मास्टरमाइंड अबू जुंदाल पर मुकदमा दोबारा शुरू होगा। यह वही केस है, जो सात साल से रुका हुआ था।

मुंबई शहर, जिसे कभी “ड्रीम सिटी” कहा जाता था, 26 नवंबर 2008 की रात नींद से नहीं, गोलियों की आवाज़ों से जागा था। वो दिन देश की यादों में अब भी जिंदा है — जब 10 आतंकवादी अरब सागर के रास्ते मुंबई में दाखिल हुए और कुछ ही घंटों में शहर को दहला दिया। ताज होटल, नरीमन हाउस, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस और लियोपोल्ड कैफ़े जैसे व्यस्त इलाकों में चली अंधाधुंध गोलीबारी ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था । 166 लोग मारे गए, सैकड़ों घायल हुए, और लाखों भारतीयों के दिलों पर डर और ग़ुस्से का निशान हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
इन आतंकियों को पाकिस्तान से प्रशिक्षित किया गया था। और इन सबके पीछे जो नाम धीरे-धीरे सामने आया, उनमें से एक था। अबू जुंदाल, जिसे सुरक्षा एजेंसियाँ हमले का “हैंडलर” बताती हैं।
अब हाईकोर्ट ने क्या कहा?
सोमवार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति आर.एन. लड्ढा की एकल पीठ ने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज़ आरोपी को नहीं दिए जा सकते। ये संवेदनशील प्रकृति के हैं और इन्हें सार्वजनिक करने से भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं।”इस फैसले के साथ ही अब सात साल से रुका हुआ ट्रायल फिर से शुरू हो सकेगा। अबू जुंदाल पर लगे गंभीर आरोपों की सुनवाई स्पेशल कोर्ट में दोबारा शुरू होगी।
कौन है अबू जुंदाल?
अबू जुंदाल का असली नाम जबीउद्दीन अंसारी है। वो महाराष्ट्र के बीड ज़िले का रहने वाला है। अबू ने 2000 के दशक की शुरुआत में लश्कर-ए-तैयबा से हाथ मिला लिया था। जांच एजेंसियों का कहना है कि वही पाकिस्तान में बैठे-बैठे 26/11 के आतंकियों को रीयल टाइम इंस्ट्रक्शन दे रहा था। यानी किस दिशा में जाना है, किस होटल को निशाना बनाना है, यह सब जुंदाल के आदेश पर हो रहा था।
2008 में हमले के बाद से ही जुंदाल भारत की वांछित सूची में था। लेकिन उसका हाथ लगना आसान नहीं था। वो पाकिस्तान से लेकर सऊदी अरब तक कई देशो पहचान बदलकर घूमता रहा ।
कैसे हुई गिरफ़्तारी
साल 2012 जब भारत को बड़ी कामयाबी मिली। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने अबू जुंदाल को गिरफ्तार किया। आधिकारिक रिकॉर्ड में बताया गया कि जुंदाल को दिल्ली एयरपोर्ट के बाहर पकड़ा गया।
हालांकि, खुद जुंदाल ने अदालत में दावा किया कि उसे सऊदी अरब में पकड़ा गया था और बाद में भारत को सौंपा गया। इसी को साबित करने के लिए उसने अदालत से कुछ गोपनीय दस्तावेज़ मांगे थे। जिनसे वो यह दिखा सके कि उसकी गिरफ्तारी कानूनी नहीं थी।
लेकिन इन दस्तावेज़ों में सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े संवेदनशील विवरण थे। जिन्हें सरकार साझा नहीं करना चाहती थी। और यहीं से पूरा मामला उलझ गया।

ट्रायल क्यों रुका था सात साल तक
2018 में मुंबई की एक स्पेशल कोर्ट ने फैसला दिया था कि जुंदाल को कुछ दस्तावेज़ दिखाए जाएं, ताकि वह अपने पक्ष में तर्क दे सके। लेकिन इस आदेश को दिल्ली पुलिस, नागरिक उड्डयन मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने चुनौती दी।
इन संस्थाओं का कहना था कि वे दस्तावेज़ राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं और अगर वे सार्वजनिक हुए तो देश की गुप्त सूचनाएं उजागर हो सकती हैं। इसके बाद से ही ट्रायल रुक गया। और पिछले सात सालों से यह मुकदमा ठंडे बस्ते में पड़ा था।
26/11 हमला — आतंक का वो दिन जिसने भारत को बदल दिया
26 नवंबर 2008 को रात करीब 8 बजे मुंबई तट पर कसाब और उसके साथियों ने कदम रखा। वे समुद्र के रास्ते आए, रास्ते में एक भारतीय मछुआरे का जहाज़ छीन लिया, और फिर शहर के बीचोंबीच मौत का तांडव शुरू कर दिया।
तीन दिनों तक चली गोलीबारी में ताज होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट, नरीमन हाउस, छत्रपति शिवाजी स्टेशन और लियोपोल्ड कैफ़े जैसे प्रतीकात्मक स्थान आतंकियों के निशाने पर थे। कई पुलिस अधिकारी, कमांडो और निर्दोष नागरिक मारे गए।
आख़िरकार, 29 नवंबर की सुबह राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) ने सभी आतंकियों को मार गिराया। सिर्फ अजमल आमिर कसाब जिंदा पकड़ा गया। जिसे बाद में अदालत ने फांसी की सज़ा दी। लेकिन जांच में सामने आया कि मुंबई में बैठे आतंकियों को पाकिस्तान के कंट्रोल रूम से लगातार निर्देश दिए जा रहे थे ।
जांच एजेंसी के मुताबिक
जांच एजेंसियों के मुताबिक, अबू जुंदाल लश्कर का वो ऑपरेटिव था जो हिंदी में आतंकियों से बात करता था। उसने उन्हें सिखाया कि “कैसे भारतीयों की तरह बात करनी है” ताकि पहचान छिपी रहे। हमले के दौरान वह पाकिस्तान में मौजूद कंट्रोल रूम से आतंकियों को “अगला कदम” बताता रहा।
इतना ही नहीं, कहा जाता है कि जुंदाल ने ही आतंकियों को होटलों के नक्शे दिखाए थे और उन्हें “अधिकतम नुकसान” पहुंचाने की रणनीति दी थी।
अब आगे क्या?
अब जब हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया है, तो 26/11 का यह लंबित केस फिर से आगे बढ़ेगा। कानूनी प्रक्रिया तेज होगी, गवाहों को बुलाया जाएगा, और भारत की सबसे बड़ी आतंकी सुनवाई फिर पटरी पर लौटेगी
26/11 के बाद भारत की सुरक्षा नीति में बदलाव –
इस हमले के बाद भारत ने अपने सुरक्षा ढांचे में बड़े सुधार किए।
- NIA (National Investigation Agency) की स्थापना हुई।
- Coastal Security Network को मज़बूत किया गया।
- और आतंकी हमलों से निपटने के लिए त्वरित प्रतिक्रिया बल तैयार किए गए।
आज भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियाँ पहले से कहीं ज़्यादा सतर्क हैं लेकिन जब तक 26/11 जैसे मामलों का मुकदमा पूरा नहीं होता, तब तक वह ज़ख्म पूरी तरह नहीं भरता।