Fact Check
Search

क्लाउड सीडिंग से बारिश कराना कितना आसान है? दिल्ली में क्लाउड सीडिंग का ट्रायल हुआ फेल !

राजधानी में प्रदूषण

राजधानी में प्रदूषण कम करने के लिए की गई कृत्रिम बारिश की कोशिश असफल रही; मंगलवार को दो उड़ानें हुईं, 14 फ्लेयर्स छोड़े गए, पर नमी सिर्फ 15% होने से बारिश नहीं हो पाई।

राजधानी में प्रदूषण

दिल्ली: राजधानी दिल्ली में हवा में बढ़ते ज़हर से राहत दिलाने के लिए पहली बार क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश का प्रयोग किया गया। ये ट्रायल आईआईटी कानपुर की टीम ने किया था। लेकिन घंटों इंतज़ार के बाद भी आसमान से एक बूंद पानी नहीं गिरा। विशेषज्ञों ने बताया कि बादलों में नमी बहुत कम थी, इसलिए बारिश होना मुमकिन नहीं था।

 

दो उड़ानें और 14 फ्लेयर्स

आईआईटी कानपुर की टीम ने जानकारी दी कि दो उड़ानें भरी गईं थी । दोनों में मिलाकर कुल 14 फ्लेयर्स छोड़े गए। ये फ्लेयर्स खास केमिकल से बने थे। जो बादलों में मिलकर बारिश को प्रेरित करते हैं। लेकिन उस समय आसमान में मौजूद नमी सिर्फ़ 10 से 15 फीसदी थी, जबकि बारिश करवाने के लिए कम से कम 50 फीसदी नमी चाहिए होती है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में केवल नोएडा में 0.1 मिमी और ग्रेटर नोएडा में 0.2 मिमी बारिश दर्ज की गई। जो नाममात्र की थी।

 

 

आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट में खुलासा

आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि कम आर्द्रता के कारण प्रयोग सफल नहीं हो सका। टीम ने कहा कि “उन्होंने बादलों की स्थिति और हवा की दिशा का पूरा विश्लेषण किया, लेकिन जब नमी ही इतनी कम थी, तो बारिश की संभावना लगभग शून्य रह गई।”
आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रोफेसर मनिंदर अग्रवाल ने बताया कि, “हमने दो ट्रायल किए, लेकिन बादलों में पर्याप्त नमी नहीं थी। बारिश नहीं हुई, इसलिए इसे सफल नहीं कहा जा सकता। फिर भी हम कल दोबारा कोशिश करेंगे।”

 

कहां-कहां हुआ ट्रायल

क्लाउड सीडिंग की शुरुआत कानपुर और मेरठ एयरफील्ड से हुई थी। दोनों विमानों ने दिल्ली और आसपास के इलाकों जैसे खेकड़ा, बुराड़ी, उत्तरी करोल बाग, मयूर विहार, सादकपुर और भोजपुर के ऊपर उड़ान भरी। इन फ्लेयर्स में सोडियम क्लोराइड और सोडियम आयोडाइड जैसे रसायन थे जो नमी के साथ मिलकर बारिश पैदा करने में मदद करते हैं। लेकिन इस बार मौसम बहुत सूखा था, इसलिए रासायनिक प्रतिक्रिया पूरी नहीं हो पाई।

क्या हुआ जब ट्रायल खत्म हुआ?

पहले ट्रायल के बाद आईआईटी कानपुर की टीम को उम्मीद थी कि 15 मिनट से 4 घंटे के भीतर बारिश होगी। लेकिन देर रात तक कहीं भी बूंदाबांदी नहीं हुई। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में थोड़ी बहुत नमी के कारण हल्की फुहारें दर्ज की गईं, लेकिन दिल्ली में आसमान सूखा रहा।

पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि यह प्रयोग सीमित असर दिखाने वाला रहा। उन्होंने कहा, “हम मौसम की स्थिति पर लगातार नज़र रख रहे हैं। बुधवार को दो और उड़ानों के जरिए क्लाउड सीडिंग की जाएगी।”

 

राजनीतिक घमासान

क्लाउड सीडिंग के नाकाम होने के बाद दिल्ली की राजनीति गरमा गई। आम आदमी पार्टी ने इसे ‘ फर्जीवाड़ा ‘ बताया। आप के दिल्ली अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने कहा कि “दिल्ली में कृत्रिम बारिश कराने की बात तो हुई, लेकिन आसमान में एक बूंद भी नहीं गिरी। भाजपा सरकार सिर्फ दिखावा कर रही है।”

उन्होंने मज़ाक में कहा, “शाम हो गई, पर बारिश नहीं आई। इंद्र देवता का क्रेडिट लेने की कोशिश की गई, लेकिन बादल भी गायब हो गए।” बुराड़ी विधायक संजीव झा और कोंडली विधायक कुलदीप कुमार ने भी कहा कि उनकी विधानसभा में कहीं बारिश नहीं हुई। वहीं, भाजपा नेताओं ने इसे “वैज्ञानिक प्रयोग” बताया और कहा कि “कम नमी के बावजूद यह तकनीकी तौर पर अहम पहल है।”

क्यों नहीं हुई बारिश?

वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लाउड सीडिंग के लिए कम से कम 50% नमी जरूरी होती है। उस दिन हवा में नमी का स्तर सिर्फ़ 15-20% था। जब हवा इतनी सूखी हो, तो बादल पर्याप्त मात्रा में नहीं बन पाते। और जब बादल ही नहीं होते, तो केमिकल फ्लेयर्स का असर बेकार चला जाता है। आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों ने बताया कि “क्लाउड सीडिंग का उद्देश्य केवल बारिश करवाना ही नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि कौन-सी परिस्थितियों में यह प्रक्रिया सफल हो सकती है।”

इतिहास में तीसरी बार हुई क्लाउड सीडिंग

दिल्ली में इससे पहले दो बार ही क्लाउड सीडिंग हुई थी — पहली बार 1957 में और दूसरी बार 1972 में। उस समय यह प्रयोग जमीन से किया गया था, यानी रासायनिक पदार्थ जमीन से ऊपर भेजे गए थे। इस बार 53 साल बाद फिर से यह प्रयास किया गया।

पर्यावरण मंत्री ने बताया कि अब आने वाले दिनों में 9 से 10 और ट्रायल किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि, “हर बार से हम सीख रहे हैं। अगर नमी ज्यादा होगी, तो अगले प्रयास में निश्चित रूप से परिणाम बेहतर मिलेंगे।”

क्या है क्लाउड सीडिंग?

क्लाउड सीडिंग एक ऐसी वैज्ञानिक तकनीक है जिसमें विशेष रासायनिक पदार्थ (जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड) बादलों में छोड़े जाते हैं। ये केमिकल्स बादलों में मौजूद नमी को आकर्षित करके बड़े जलकण बनाते हैं, जिससे बारिश होती है। इस प्रक्रिया को अक्सर उन इलाकों में किया जाता है जहां बारिश बहुत कम होती है या प्रदूषण बढ़ जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य हवा में मौजूद धूल और जहरीले कणों को नीचे गिराना है ताकि वायु गुणवत्ता में सुधार हो सके।

दिल्ली में मंगलवार को किया गया क्लाउड सीडिंग का प्रयोग फिलहाल असफल रहा। लेकिन वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी है। दोबारा दो उड़ानें भरने की योजना है। अगर उस दिन हवा में नमी बढ़ी, तो दिल्ली में 53 साल बाद कृत्रिम बारिश देखने को मिल सकती है।

बिहार में हजारों स्टार्टअप ! लिस्ट में पंजाब-झारखंड से भी आगे, फिर भी पलायन क्यों नहीं रोक पा रही सरकार ?

Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

Leave a Comment

Your email address will not be published.