क्या है ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’! जिस पर अक्सर उठता है विवाद , PM मोदी ने जिस शब्द को बताया ‘नकारात्मक’, जानिए उसका असली इतिहास

क्या हिंदू होने का मतलब सुस्त होना है? क्या ये शब्द भी साम्राज्यवादी मानसिकता का ही एक उदाहरण है । हाल के दिनों में “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” शब्द अचानक सुर्खियों में आ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने एक संबोधन में कहा कि इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह भारत की संस्कृति और हिंदू समाज के लिए अपमानजनक अर्थ पैदा करता है। लेकिन असली सवाल यह है कि हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ शब्द आया कहां से?
यह शब्द सबसे पहले कब और किसने इस्तेमाल किया?
भारत की आर्थिक बहस में “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” शब्द का उपयोग पहली बार 1978 में प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर राज कृष्णा ने किया था। उन्होंने भारत की जीडीपी वृद्धि दर का लंबा ट्रेंड देखा और पाया कि 1950 से लेकर 1980 तक करीब तीन दशक तक भारत की औसत विकास दर 3.5% के आसपास ही अटकी रही। कई उतार-चढ़ावों के बावजूद यह ग्रोथ स्थिर बनी रही न बहुत ऊपर गई, न बहुत नीचे गिरी । इसी लगातार ठहरी हुई विकास दर को दर्शाने के लिए उन्होंने चेतावनी के रूप में यह शब्द गढ़ा—“Hindu Rate of Growth”।
ध्यान देने वाली बात यह है कि इस शब्द का हिंदू धर्म या संस्कृति से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। प्रोफेसर राज कृष्णा केवल यह बताना चाहते थे कि भारत की अर्थव्यवस्था एक ऐसी “जड़ता” में फंसी हुई है, जहां नीतिगत बदलाव के बावजूद विकास की रफ़्तार बढ़ नहीं पा रही है।
आलोचकों का क्या मानना है
लेकिन आलोचक लगातार इस प्रकार का आरोप लगाते रहे है कि सालों तक दुनिया में यह नैरेटिव गढ़ा गया कि भारत विकास नहीं कर सकता, क्योंकि यह उसकी परंपरागत ठहराव की प्रवृत्ति है। यह एक बेहद चालाकी भरा तर्क था। वो भारत की असल समस्या सरकारों की नीतियों का असफल होना है उनको शामिल नहीं करता है । ये एक समाज पर दोष मढ़ देने जैसा है ।
प्रोफेसर बालकृष्णन के आंकड़ों के अनुसार, अंग्रेजों के शासन में भारत की ग्रोथ रेट केवल 0.9% थी। आज़ादी के बाद वही भारत 4.1% की गति से बढ़ने लगा। और हैरानी की बात यह है कि उसी दौर में जिस चीन को आज विकास का प्रतीक माना जाता है, उसकी ग्रोथ रेट महज 2.9% थी—यानी हम चीन से आगे थे
हमारी आबादी तेज़ी के अनुपात में प्रति व्यक्ति आय कम दिखती थी, लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि भारत का विकास संभव नहीं है । जो दुनिया कभी भारत को “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” का ताना देती थी, वही अब भारत की विकास गति देखकर हैरान है।
1950–1980: आखिर जीडीपी 3–4% पर क्यों रुकी रही?
1965 और 1971 के युद्धों ने भारत की अर्थव्यवस्था और संसाधनों पर भारी दबाव डाला था । 1971 में बांग्लादेश संकट के दौरान लगभग 1.25 करोड़ शरणार्थियों का भारत आना स्थिति को और जटिल बना गया। इसी बीच 1965–66 का भीषण अकाल देश को गहरी खाद्य और आर्थिक संकट में धकेल रहा था। उद्योग और सेवा क्षेत्र की प्रगति भी बेहद धीमी थी, जबकि सरकारी नियंत्रण और लाइसेंस-परमिट राज ने विकास की रफ्तार को और बाधित किया। इन सबके साथ तेजी से बढ़ती जनसंख्या ने चुनौतियों को कई गुना बढ़ा दिया, जिससे देश के लिए आगे बढ़ना और भी मुश्किल हो गया।
जीडीपी क्या है और 3.5% की गति का मतलब क्या था?
जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद, किसी वर्ष में देश में उत्पादन और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है। 1950 से 1980 तक भारत का औसत ग्रोथ रेट 3.5% रहा। कई वर्षों में यह इससे भी नीचे रहा—1956 से 1975 के बीच औसत 3.4%। भारत उस समय कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था थी, उद्योग सीमित थे और सेवा क्षेत्र लगभग प्रारंभिक अवस्था में था। इसी कारण वृद्धि के अवसर भी सीमित थे।
दुनिया के मुकाबले भारत कहां खड़ा था?
यह नहीं कहा जा सकता कि भारत की स्थिति सबसे खराब थी।
कुछ रोचक तुलना—
चीन का ग्रोथ रेट (नेहरू युग तुलना) — 2.9%
भारत — 4.1%
जापान — 2.8%
क्या हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ का दौर हमेशा चला? नहीं!
1980 के बाद स्थिति बदलनी शुरू हुई।कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि आपातकाल के बाद धीरे-धीरे लाइसेंस-राज में ढील दी गई और निवेश, उद्योग और सेवाओं में गति आने लगी।1991 में जब भारत में बड़ा आर्थिक सुधार आया—LPG नीति (Liberalisation, Privatisation, Globalisation)—तब भारत की आर्थिक संरचना तेजी से बदली।
1981–1991 के बीच भारत 5.8% ग्रोथ रेट छूने लगा।1975–2006 के बीच औसत 5.6% तक पहुंच गया।आज भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।2025–26 की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 8.2% रही है ।
आज विवाद क्यों हुआ? प्रधानमंत्री ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में कहा कि— “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ शब्द का इस्तेमाल अपमानजनक है। यह भारत की संस्कृति का गलत चित्रण है।”उन्होंने यह भी कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रही है, इसलिए पुराने और नकारात्मक शब्दों का दोहराव सही नहीं है।