कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों दीपों की जगमगाहट, जो देती है दिव्यता और राष्ट्रीय एकता का संदेश!

हिंदू धर्म में दीपावली को केवल मनुष्यों का पर्व नहीं माना जाता। इसके लगभग पंद्रह दिन बाद ऐसा दिन आता है जब देवता स्वयं धरती पर उतरकर दिवाली मनाते हैं। इसे ही ‘देव दीपावली’ कहा जाता है।
मान्यता है कि इस दिन सभी देवी-देवता और ऋषि त्रिपुरासुर नामक राक्षस से पीड़ित थे। कार्तिक पूर्णिमा को भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया और धरती सहित सभी लोकों की रक्षा की। इस विजय के उपलक्ष्य में देवताओं ने दीप जलाकर उत्सव मनाया। तभी से इस दिन को देव दीपावली कहा जाने लगा।
आध्यात्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
देव दीपावली का महत्व केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत गहरा है।
ऐसा विश्वास है कि इस दिन पवित्र नदियों के तट पर दीपदान करने से पाप नष्ट होते हैं, भगवान का आशीर्वाद मिलता है और मोक्ष के द्वार खुलते हैं। इस दिन भगवान शिव और विष्णु की विधिवत पूजा करने से मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं।
कब मनाया जाएगा देव दीपावली
इस वर्ष देव दीपावली 5 नवंबर 2025 (बुधवार) को मनाई जाएगी। यह दिन कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को पड़ता है। जहां दीपावली अमावस्या को अंधकार के अंत का प्रतीक है, वहीं देव दीपावली पूर्णिमा को मनाई जाती है, जो प्रकाश और पुण्य की पूर्णता का प्रतीक है।इस दिन घाटों, मंदिरों और घरों को लाखों दीपों से सजाया जाता है। भक्तजन गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों के तट पर दीप जलाकर भगवान को अर्पित करते हैं। जगह-जगह आरती और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है।
देव दीपावली का सबसे भव्य आयोजन, काशी में
देव दीपावली का सबसे भव्य और प्रसिद्ध आयोजन वाराणसी (काशी) में होता है। पुराणों के अनुसार, त्रिपुरासुर के वध के बाद देवताओं ने यहीं पर दिवाली मनाई थी। तब से काशी में यह पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है।
इस दिन गंगा के घाटों पर लाखों दीप जलाए जाते हैं, जो जलधारा में प्रतिबिंबित होकर पूरे शहर को स्वर्णिम आभा से भर देते हैं।
सिर्फ घाट ही नहीं, बल्कि मंदिरों और गलियों तक दीपों की रौशनी फैल जाती है। देश-विदेश से आए श्रद्धालु और पर्यटक इस दृश्य को देखने के लिए काशी पहुँचते हैं।

चार प्रमुख तीर्थस्थल जहाँ होती है विशेष देव दीपावली
- गया (बिहार):
यहां फल्गु नदी के तट पर दीपदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलने की मान्यता है। - हरिद्वार (उत्तराखंड):
हर की पौड़ी पर जलते हजारों दीप वातावरण को दिव्यता और श्रद्धा से भर देते हैं। आरती का दृश्य किसी स्वर्गीय लोक जैसा लगता है। - प्रयागराज (उत्तर प्रदेश):
त्रिवेणी संगम पर दीपों की रोशनी संगम के पवित्र जल को दिव्यता से आलोकित कर देती है। - काशी (उत्तर प्रदेश):
देव दीपावली का सबसे भव्य रूप यहीं देखने को मिलता है। गंगा के घाटों पर लाखों दीपों की रेखा मानो तारों की नदी बन जाती है।
इनके अलावा देशभर के कई अन्य स्थानों पर भी भक्तजन मंदिरों और नदियों के किनारे दीपदान करते हैं।

क्यों मनाई जाती है दीपावली के 15 दिन बाद
- दीपावली अमावस्या को मनाई जाती है, जो अंधकार के अंत और नए प्रकाश की शुरुआत का प्रतीक है।
- इसके 15 दिन बाद आने वाली कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली मनाई जाती है।
- यह अवधि इस बात का प्रतीक है कि मानव लोक से देव लोक तक प्रकाश और पुण्य की यात्रा पूरी होती है।
पूजा-विधि और मान्यताएँ
- देव दीपावली के दिन भक्तजन गंगा-स्नान कर दीपदान करते हैं।
- भगवान शिव, विष्णु, कार्तिकेय और देवी गंगा की विशेष पूजा की जाती है।
- मंत्रोच्चार और आरती के साथ भक्त अपने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
अनोखा सांस्कृतिक उत्सव
देव दीपावली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का अद्भुत संगम है। काशी, गया, हरिद्वार और प्रयागराज जैसे शहर इस दिन दिव्यता और भक्ति की रोशनी में नहा जाते हैं। दीपों की जगमगाहट, आरती की ध्वनि और श्रद्धालुओं की भावनाएं मिलकर यह संदेश देती हैं कि प्रकाश का यह उत्सव केवल मनुष्यों का नहीं, बल्कि देवताओं का भी है।