प्रधानमंत्री मोदी ने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर दी श्रद्धांजलि, कहा “पटेल ने जो भारत जोड़ा, उसे और सशक्त बनाना हमारा कर्तव्य है।”

देश आज लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती मना रहा है।31 अक्टूबर का दिन पूरे भारत में “राष्ट्रीय एकता दिवस” (National Unity Day) के रूप में मनाया जाता है। और इस बार का समारोह बेहद खास है। गुजरात के नर्मदा जिले के एकता नगर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल को नमन करते हुए पुष्पांजलि अर्पित की और देशवासियों को एकता की शपथ दिलाई। उन्होंने कहा “भारत सरदार वल्लभभाई पटेल को उनकी 150वीं जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करता है। वे भारत के एकीकरण की प्रेरक शक्ति थे। उनकी सोच, समर्पण और कर्मठता हमेशा हमें एक सशक्त भारत की दिशा में प्रेरित करती रहेगी।”
मोदी युग में पटेल का सम्मान
प्रधानमंत्री मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तभी उन्होंने सरदार पटेल की स्मृति में एक ऐसी प्रतिमा बनाने का संकल्प लिया जो विश्व की सबसे ऊंची हो। 2013 में इस परियोजना की शुरुआत हुई और 2018 में उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी” को राष्ट्र को समर्पित किया।
182 मीटर ऊंची यह प्रतिमा आज सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि पूरे देश के गर्व का प्रतीक बन चुकी है। हर साल यहां राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह भव्य रूप से मनाया जाता है। इस वर्ष भी कार्यक्रम में बीएसएफ, सीआरपीएफ और विभिन्न राज्य पुलिस बलों की शानदार परेड आयोजित हुई, जिसमें एकता और अनुशासन का अद्भुत नज़ारा देखने को मिला।

नेहरू और पटेल – एक ही कांग्रेस, दो सोच – दो रास्ते!
भारत की आज़ादी के इतिहास में दो नाम हमेशा साथ लिए जाते हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल। दोनों ही महात्मा गांधी के सबसे करीबी सहयोगी, दोनों ने आज़ादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई, लेकिन दोनों की सोच, स्वभाव और राजनीति का तरीका एक-दूसरे से बिल्कुल अलग था। नेहरू जहां भविष्य की आधुनिक भारत की कल्पना करते थे, वहीं पटेल जमीन से जुड़ी सच्चाई और व्यावहारिकता में विश्वास रखते थे। एक ओर आदर्शवादी नेहरू थे, दूसरी ओर धरातल पर फैसले लेने वाले लौहपुरुष पटेल।
गांधी की पसंद बने नेहरू, लेकिन कांग्रेस चाहती थी पटेल
1946 का साल भारतीय राजनीति के लिए निर्णायक था। अंग्रेज़ों ने साफ कर दिया था कि अब भारत को स्वतंत्रता मिलने वाली है। सवाल था, आज़ाद भारत का पहला प्रधानमंत्री कौन होगा? कांग्रेस की प्रदेश कमेटियों से राय मांगी गई। उस समय 12 में से 11 प्रदेश कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम भेजा, जबकि किसी ने भी नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया। लेकिन इतिहास ने करवट ली, क्योंकि महात्मा गांधी ने आख़िरी फैसला अपने हाथ में लिया। गांधीजी ने कहा “जवाहरलाल को ही नेतृत्व करना चाहिए। अंग्रेज़ उनसे बातचीत करना आसान समझते हैं, वह पश्चिमी शिक्षा से परिचित हैं और दुनिया उन्हें पहचानती है।”
पटेल गांधी की इच्छा के खिलाफ नहीं गए। उन्होंने कहा, “गांधी मेरे नेता हैं, अगर उन्हें लगता है कि नेहरू देश के लिए बेहतर हैं, तो मैं उनका निर्णय सिर झुकाकर स्वीकार करता हूँ।” अगर पटेल चाहते, तो वो कांग्रेस और जनता के समर्थन से प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने सत्ता नहीं, संघर्ष और एकता का रास्ता चुना।

नेहरू का विज़न – आधुनिक भारत की कल्पना
पंडित नेहरू की सोच उस समय से काफी आगे की थी। वे भारत को औद्योगिक, वैज्ञानिक और समाजवादी दिशा में ले जाना चाहते थे। उनकी नज़र पश्चिमी देशों के विकास मॉडल पर थी। उन्होंने कहा था, “भारत को तकनीक और उद्योग के बिना आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सकता।” नेहरू को लोकतंत्र, संसद और संविधान पर पूरा भरोसा था। वे चाहते थे कि भारत शिक्षा, विज्ञान, और वैश्विक संबंधों में अग्रणी बने। यही वजह थी कि आज़ादी के बाद उन्होंने भारी उद्योगों, आईआईटी, इसरो जैसी संस्थाओं की नींव रखी। उनकी सोच अंतरराष्ट्रीय थी — वे भारत को दुनिया के मंच पर एक ‘विश्व नेता’ बनाना चाहते थे।
पटेल का विज़न – एकता और व्यावहारिकता का प्रतीक
सरदार पटेल, जिन्हें लोग ‘लौह पुरुष’ कहते हैं, ने आज़ाद भारत की नींव मजबूत की। जहां नेहरू अंतरराष्ट्रीय मंचों की सोच रखते थे, वहीं पटेल का ध्यान भारत के आंतरिक ढांचे पर था। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी — 552 देसी रियासतों का विलय। आज जो भारत का नक्शा एकजुट दिखता है, उसमें पटेल का निर्णायक योगदान था। जूनागढ़, हैदराबाद, और कई रियासतें जो पाकिस्तान में जाने को तैयार थीं, उन्हें पटेल ने अपने साहस और रणनीति से भारत में जोड़ा। नेहरू जहां शांति और वार्ता के रास्ते पर चलते थे, वहीं पटेल ज़रूरत पड़ने पर एक्शन के रास्ते पर भी उतर आते थे।

नेहरू और पटेल के मतभेद – विचारों की नहीं, दृष्टिकोण की लड़ाई
दोनों में मतभेद कई मुद्दों पर थे, पर एक-दूसरे के प्रति सम्मान कभी कम नहीं हुआ। नेहरू आदर्शवादी थे, पटेल यथार्थवादी। कश्मीर, विदेश नीति, और प्रशासनिक ढांचे जैसे विषयों पर दोनों के बीच अक्सर राय अलग होती थी।
- कश्मीर मसला
कश्मीर को लेकर पटेल का मानना था कि वहां तुरंत सख्त एक्शन होना चाहिए। वे राजा हरि सिंह के साथ समझौते के पक्ष में थे, लेकिन नेहरू ने शेख अब्दुल्ला पर भरोसा किया। नेहरू की नीति ‘संयुक्त राष्ट्र में मामला ले जाने’ की थी, जबकि पटेल इसका विरोध कर रहे थे। अगर उस वक्त पटेल का रास्ता अपनाया गया होता, तो शायद कश्मीर का इतिहास कुछ और होता।
- विदेश नीति
नेहरू का झुकाव ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ और शांति की नीति की ओर था। वे चाहते थे कि भारत विश्व राजनीति में एक नैतिक शक्ति बने। वहीं पटेल का मानना था कि देश की सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित पहले आने चाहिए। उनका दृष्टिकोण “पहले भारत, बाद में विश्व” था।
- आर्थिक नीतियाँ
नेहरू राज्य-नियंत्रित समाजवादी मॉडल के समर्थक थे।पटेल मानते थे कि भारत को उद्योग और व्यापार के लिए निजी क्षेत्र को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। वे किसानों और छोटे व्यापारियों को देश की रीढ़ मानते थे।
- व्यक्तित्व में भी था अंतर
नेहरू एक करिश्माई वक्ता और विद्वान थे। उनका व्यक्तित्व आकर्षक था, और वे अंतरराष्ट्रीय नेताओं के बीच सहज महसूस करते थे।पटेल सादगी और दृढ़ता के प्रतीक थे। वे कम बोलते थे, लेकिन जो कहते थे, वह पत्थर की लकीर होता था।
- कांग्रेस के भीतर बदलते समीकरण
आजादी के बाद कांग्रेस में नेहरू का प्रभाव लगातार बढ़ता गया। पटेल उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने, लेकिन कई फैसलों में उन्हें अनदेखा किया गया। फिर भी, उन्होंने कभी विरोध नहीं किया — क्योंकि उनके लिए देश पहले था, पद बाद में। 1949 में जब पटेल का स्वास्थ्य बिगड़ा, तो नेहरू खुद उन्हें देखने गए। पटेल ने मुस्कुराते हुए कहा — “जवाहर, हमारे मतभेद विचारों के हैं, दिलों के नहीं।”यही संवाद दोनों नेताओं के रिश्ते की गहराई बताता है।

पटेल की विरासत को सहेजती भाजपा
कांग्रेस ने आज़ादी के बाद लंबे समय तक पटेल को उतनी जगह नहीं दी, जितनी नेहरू को मिली। लेकिन भाजपा ने पटेल की विरासत को ‘राष्ट्रीय एकता’ के प्रतीक के रूप में सामने रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के नर्मदा तट पर ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ बनवाकर पटेल की याद को अमर कर दिया। 182 मीटर ऊँची यह प्रतिमा आज दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति है — और भारत की एकता की पहचान भी।
कांग्रेस और पटेल — एक अधूरा रिश्ता
हालांकि आज हर पार्टी सरदार पटेल को याद करती है, लेकिन यह भी सच है कि उनके जीवनकाल और निधन के बाद कांग्रेस ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। 1975 में जब उनकी जन्मशती आई, तब कांग्रेस सरकार ने कोई बड़ा आयोजन नहीं किया था। इसके विपरीत, 1989 में पंडित नेहरू की जन्मशती पर पूरे देश में सरकारी कार्यक्रमों की धूम थी। आज जब भाजपा और केंद्र सरकार पटेल को राष्ट्रीय नायक के रूप में सम्मानित कर रही है, तो कांग्रेस यह कहकर विरोध करती है कि भाजपा उनकी विरासत पर “दावा” कर रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि पहले जनसंघ और बाद में भाजपा ने ही पटेल को बार-बार याद किया और उन्हें जनमानस से जोड़े रखा।
दोनों सही थे, और शायद इसीलिए भारत आज भी इन दोनों महान नेताओं के योगदान पर गर्व करता है। सरदार वल्लभभाई पटेल भारत के पहले गृह मंत्री थे। आजादी के बाद जब देश 552 रियासतों में बंटा हुआ था, तब इन्हीं पटेल ने उन्हें एक धागे में पिरोने का काम किया। कई रियासतों के राजा अलग राह पर जाना चाहते थे। कोई पाकिस्तान में विलय चाहता था, तो कोई आज़ाद रहना चाहता था। लेकिन पटेल की दूरदर्शिता, साहस और राजनीतिक कौशल ने वह कर दिखाया जो असंभव लगता था। उन्होंने अपनी दृढ़ता और बातचीत की रणनीति से जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसे जटिल मामलों को सुलझाया। इसलिए उन्हें “भारत का लौह पुरुष” (Iron Man of India) कहा गया।
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