भ्रष्टाचार के मामले सुलझाने में फिसड्डी ,पर खुद शाही सवारी में लोकपाल! ₹5 करोड़ की BMW के टेन्डर पर बवाल”
देश की भ्रष्टाचार विरोधी सर्वोच्च संस्था लोकपाल इन दिनों खुद विवादों के घेरे में है। भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली इस संस्था पर अब फिजूलखर्ची का आरोप लग रहा है। हाल ही में लोकपाल ने 7 लग्जरी कारों की खरीद के लिए टेंडर जारी किया है, जिनकी कीमत करीब 70 लाख रुपये प्रति कार बताई जा रही है। कुल मिलाकर यह खरीद लगभग 5 करोड़ रुपये की है। बताया जा रहा है कि ये गाड़ियाँ BMW 3-सीरीज़ 330Li (M स्पोर्ट) मॉडल की होंगी। यह जानकारी सार्वजनिक होते ही लोकपाल की नीयत और प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े हो गए हैं।
16 अक्टूबर को जारी हुआ था टेन्डर
लोकपाल ने यह टेंडर 16 अक्टूबर 2025 को जारी किया था। दस्तावेज़ में साफ लिखा गया है कि संस्था को सात सफेद रंग की BMW 3-Series कारों की आवश्यकता है। इसमें यह भी उल्लेख है कि गाड़ियाँ दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में रजिस्टर होंगी और उनकी ऑन-रोड कीमत 69.5 से 70 लाख रुपये के बीच होगी। टेंडर की एक दिलचस्प शर्त यह भी है कि कारें डिलीवर होने के बाद ड्राइवरों और स्टाफ को सात दिन की ट्रेनिंग दी जाएगी, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक फीचर्स, सेफ ड्राइविंग, मेंटेनेंस और अन्य तकनीकी जानकारी शामिल होगी।
अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस संस्था का गठन भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए हुआ था, वही संस्था खुद इतना भारी खर्च क्यों कर रही है? यह वही लोकपाल है जिसकी आलोचना पहले से ही इस बात को लेकर होती रही है कि वह शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पा रही। आंकड़ों के मुताबिक अब तक लोकपाल को लगभग 8,700 से ज्यादा शिकायतें मिली हैं, जिनमें से केवल 24 मामलों में जांच और 6 मामलों में अभियोजन हुआ है। ऐसे में जब कार्रवाई का ग्राफ इतना कमजोर हो, तो करोड़ों की लग्जरी गाड़ियाँ खरीदने की मंशा जनता को बुरा लगना स्वाभाविक है।
विपक्ष हुआ हमलावर
इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने लोकपाल पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट के जजों को सादे सेडान वाहन मिलते हैं, तो लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों को BMW की क्या आवश्यकता है? वहीं कांग्रेस प्रवक्ता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “8703 शिकायतें, 24 जांच, 6 अभियोजन और अब 70 लाख की BMW – यह भ्रष्टाचार विरोधी संस्था ‘पैंथर’ से ज्यादा ‘पडल’ लगती है।” तृणमूल कांग्रेस ने भी इसे जनता के लिए “अपमान” करार देते हुए पूछा कि आखिर किसके लिए यह करोड़ों का खर्च किया जा रहा है।
पूर्व नीति आयोग प्रमुख अमिताभ कांत ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सुझाव दिया कि इस टेंडर को रद्द कर दिया जाए और इसके बजाय “मेक इन इंडिया” के तहत बनी इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड कारें खरीदी जाएं, ताकि देश की स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिले और लोकपाल जैसी संस्थाएं उदाहरण पेश कर सकें।

वित्तीय पारदर्शिता पर भी उठे गंभीर सवाल
इसके अलावा इस खरीद को लेकर वित्तीय पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। क्या इस खरीद से पहले अन्य सस्ते या स्वदेशी विकल्पों पर विचार किया गया था? क्या यह खरीद सरकारी दिशानिर्देशों और खर्च सीमा के अनुरूप है? इन सबका स्पष्ट जवाब लोकपाल की ओर से अभी तक नहीं मिला है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि लोकपाल का वार्षिक बजट लगभग 50 करोड़ रुपये है, तो 10% हिस्सा सिर्फ कारों पर खर्च करना “गैर-जरूरी विलासिता” है।
यह पूरा मामला केवल वाहनों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संस्था की नैतिक साख और जनविश्वास का भी मामला है। जिस लोकपाल से देश यह उम्मीद करता है कि वह बड़े-बड़े भ्रष्टाचार मामलों की जांच करेगा और सत्ता के गलियारों में जवाबदेही तय करेगा, वही संस्था अब एक “विलासिता विवाद” में फंस गई है। इससे उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है।