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लद्दाख ने ठुकराया केंद्र का बड़ा ऑफर! ‘पूर्ण राज्य’ और ‘छठी अनुसूची’ की मांग पर क्यों अड़े लोग ?

लद्दाख ने ठुकराया केंद्र का बड़ा ऑफर

24 सितंबर की हिंसा के बाद केंद्र और स्थानीय संगठनों के बीच फिर शुरू हुई बातचीत, लेकिन लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस अनुच्छेद 371 के प्रस्ताव से नाखुश — लद्दाखी चाहते हैं पूर्ण राज्य का दर्जा, जनजातीय स्वशासन और अपने संसाधनों पर अधिकार।

लद्दाख ने ठुकराया केंद्र का बड़ा ऑफर

लद्दाख, जो कभी जम्मू-कश्मीर का अभिन्न हिस्सा था, आज अपने अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई के एक नए मोड़ पर है। लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस ने केंद्र सरकार के प्रस्तावों को ठुकराते हुए अपनी मूल मांग — पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल किए जाने — पर अडिग रुख अपनाया है।  हाल ही में केंद्र के अधिकारियों और दोनों संगठनों के बीच बातचीत फिर शुरू हुई, लेकिन अब भरोसे की डोर कमजोर पड़ती जा रही है।

24 सितंबर की हिंसा से भड़का जनाक्रोश

24 सितंबर की हिंसा, जिसमें पुलिस कार्रवाई के दौरान चार लोगों की मौत हुई, ने पूरे लद्दाख को हिला दिया। इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई कि आखिर लद्दाख को कब तक केंद्र शासित प्रदेश के प्रयोगशाला मॉडल में रखा जाएगा, जबकि वहां के लोग अपने अधिकारों और प्रतिनिधित्व के लिए सड़कों पर उतर आए हैं।

अनुच्छेद 371 – संविधान में विशेष प्रावधानों की नींव

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371 से लेकर 371(J) तक ऐसे प्रावधान हैं जो कुछ राज्यों को विशेष अधिकार देते हैं। इनका उद्देश्य स्थानीय परंपराओं की रक्षा, पिछड़े क्षेत्रों का विकास और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना है।

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते ही अनुच्छेद 371 अस्तित्व में आया। समय के साथ अलग-अलग राज्यों की जरूरतों के अनुसार इसमें संशोधन जोड़े गए। आज देश के 12 राज्य — महाराष्ट्र, गुजरात, नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, सिक्किम, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा और कर्नाटक — इस अनुच्छेद के तहत विशेष शक्तियों का लाभ उठा रहे हैं।

इन प्रावधानों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र सरकार तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती जब तक राज्य विधानसभा अपनी सहमति न दे। उदाहरण के तौर पर, नागालैंड में भूमि और संसाधनों से जुड़े कानूनों पर संसद तभी निर्णय ले सकती है जब राज्य विधानसभा उसे मंजूरी दे।

अगर लद्दाख में लागू हुआ अनुच्छेद 371 तो क्या बदलेगा

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लद्दाख को अनुच्छेद 371 के दायरे में लाया गया तो यह न सिर्फ प्रशासनिक सुधार लाएगा बल्कि स्थानीय समाज के हितों की गारंटी भी बनेगा।

संभावित बदलाव होंगे –

  • भूमि और संसाधनों पर स्थानीय स्वामित्व रहेगा, बाहरी लोगों द्वारा जमीन की खरीद पर रोक लग सकती है।
  • सरकारी नौकरियों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।
  • बौद्ध और मुस्लिम समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं को संवैधानिक सुरक्षा मिलेगी।
  • स्थानीय शासन को अधिक अधिकार मिलेंगे और केंद्र का हस्तक्षेप घटेगा।

लद्दाख की जनता केंद्र के प्रस्ताव से क्यों नाराज़ है

केंद्र ने अनुच्छेद 371 जैसे विशेष प्रावधान देने का संकेत तो दिया, लेकिन लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस दोनों ही इस प्रस्ताव को अधूरा समाधान मानते हैं।

उनकी चार प्रमुख मांगें हैं —

  • लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए ताकि स्थानीय सरकार चुनी जा सके।
  • छठी अनुसूची में शामिल किया जाए ताकि जनजातीय समुदायों को संवैधानिक सुरक्षा मिले।
  • सोनम वांगचुक और अन्य प्रदर्शनकारियों को रिहा किया जाए।
  • हिंसा में मारे गए लोगों को उचित मुआवजा दिया जाए।

इन संगठनों का कहना है कि जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तब वहां विधानसभा नहीं दी गई, जिससे लोगों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व खत्म हो गया।

सोनम वांगचुक – आंदोलन का चेहरा

लद्दाख के पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इस आंदोलन के प्रमुख चेहरे हैं। वे 10 सितंबर से भूख हड़ताल पर बैठे थे और उनकी मांग थी कि लद्दाख के लोगों को आत्मशासन का अधिकार दिया जाए। 24 सितंबर को हिंसा भड़कने के बाद पुलिस ने उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया। उनकी गिरफ्तारी के बाद से पूरे लद्दाख में आंदोलन और उग्र हो गया है। लोगों का कहना है कि विकास के नाम पर केंद्र सरकार उनकी भूमि, संसाधन और पहचान पर कब्जा कर रही है।

आंदोलन की जड़ें

2019 में जब अनुच्छेद 370 हटाया गया और जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन हुआ, तब लद्दाख को बिना विधानसभा के अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। पहले जहां लद्दाख के पास जम्मू-कश्मीर विधानसभा में चार सीटें थीं, अब उसकी अपनी कोई आवाज नहीं है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उनकी पारंपरिक संस्कृति, संसाधन और रोजगार पर खतरा मंडरा रहा है। पर्यटन और उद्योग के नाम पर बाहरी निवेश बढ़ रहा है, जिससे भूमि स्थानीयों के हाथ से निकलने का डर है।

लद्दाखियों की प्रमुख मांगें –

  • लद्दाख को पूर्ण राज्य बनाया जाए।
  • लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटें दी जाएं।
  • सरकारी नौकरियों में खाली पद भरे जाएं।
  • जनजातीय क्षेत्रों को संवैधानिक दर्जा दिया जाए।

आगे की राह

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई है, जो अगले दस दिनों में उपसमितियों के साथ बैठक करेगी। यह समिति तय करेगी कि लद्दाख को अनुच्छेद 371 जैसे विशेष प्रावधानों के तहत अधिकार दिए जाएं या छठी अनुसूची में शामिल किया जाए। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि सरकार किस दिशा में जाएगी, क्योंकि यदि लद्दाख को राज्य का दर्जा दिया गया तो यह जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम में बड़ा बदलाव होगा।

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Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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