52 बूटी शिल्प – संस्कृति और पारंपरिक कलाओं के लिए जाना जाता हैं । विलुप्त हो रही थी इस कला की वापसी की कहानी आज हर भारतीय को जाननी चाहिए !
बिहार की 52 बूटी शिल्प: विरासत जो फिर से चमक रही
हैं !

पटना। बिहार हमेशा से अपनी समृद्ध संस्कृति और पारंपरिक कलाओं के लिए जाना जाता रहा है। समय के साथ कई कलाएँ फीकी पड़ गईं, लेकिन अब उनमें से एक अनोखी कला — 52 बूटी शिल्प फिर से अपनी पहचान बना रही है। यह कला न केवल परंपरा की निशानी है, बल्कि आज के समय में रोजगार और आत्मनिर्भरता की भी कहानी कह रही है।
क्या है 52 बूटी शिल्प?
52 बूटी शिल्प एक बेहद बारीक हाथ से की जाने वाली कढ़ाई कला है, जो शॉल, साड़ी, चादर, टेबल क्लॉथ और पर्दों जैसे उत्पादों में देखने को मिलती है। इसकी खासियत है — कपड़े पर 52 जगहों पर की गई नाज़ुक बूटी (डिज़ाइन)।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सतयुग में भगवान विष्णु के वामन अवतार की ऊंचाई 52 उंगली थी, और इसी से इस कला का नाम “52 बूटी” पड़ा। इस शिल्प में परंपरा, आस्था और शिल्पकारों का अद्भुत कौशल झलकता है।

परंपरा जो अब मिटने लगी थी
बिहार में शादी-ब्याह में 52 बूटी की साड़ी को शुभ माना जाता था। इसे लड़की की ओर से वर पक्ष को भेजना एक परंपरा थी। लेकिन आधुनिकता के दौर में यह रिवाज़ धीरे-धीरे खोने लगा। बावजूद इसके, कई शिल्पकार आज भी इस कला को जीवित रखे हुए हैं।
उनकी मेहनत का नतीजा है कि अब यह कला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जगह बना रही है।
52 बूटी शिल्प को नई पहचान दिलाने में रिद्धिमा श्रीवास्तव जैसी युवा उद्यमी अहम भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने इस पारंपरिक कला को आधुनिक बाजार से जोड़ा, कई शिल्पकारों को रोज़गार दिया और 52 बूटी को फिर से चर्चा में लाया।
उनकी मेहनत के कारण आज यह कला बिहार की शान बनकर उभर रही है और दुनिया के फैशन और डिजाइन मंचों तक पहुँच रही है।

मधुबनी पेंटिंग: कला जो बोलती है मिथिला की भाषा
बिहार की एक और प्रसिद्ध हस्तकला — मधुबनी पेंटिंग — को दुनिया भर में पहचान मिली है। इसे जीआई टैग भी प्राप्त है। इस पेंटिंग में देवी-देवताओं, प्रकृति और मिथिला संस्कृति के रंगीन चित्र अंकित किए जाते हैं।
आज मधुबनी आर्ट केवल दीवारों तक सीमित नहीं, बल्कि साड़ियों, होम डेकोर और एक्सेसरीज़ में भी खूब पसंद की जा रही है। बड़े-बड़े आर्ट एग्ज़िबिशन और फोटोग्राफी शो में भी यह पेंटिंग बिहार की पहचान बन चुकी है।

भागलपुर का सिल्क उद्योग: परंपरा और आधुनिकता का संगम
भागलपुर, जिसे “सिल्क सिटी” भी कहा जाता है, बिहार का प्रमुख औद्योगिक शहर है। यहां की भागलपुरी सिल्क साड़ियाँ देश-विदेश में लोकप्रिय हैं। विशेष रूप से तसर सिल्क की मांग सबसे अधिक रहती है। यहां के बुनकर पारंपरिक तकनीक से खूबसूरत डिज़ाइन तैयार करते हैं, जो फैशन जगत में भी अपनी पहचान बना रही हैं।
बिहार की कलाओं का बढ़ता अंतरराष्ट्रीय बाजार
बिहार की हस्तकलाओं की अब मांग केवल देश में ही नहीं, बल्कि लंदन, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों में भी बढ़ रही है। इन कलाओं के निर्यात से न सिर्फ राज्य की पहचान बढ़ रही है, बल्कि हजारों कारीगरों को रोजगार भी मिल रहा है।
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