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15 मौतों के पीछे 10 साल पुरानी फाइल! लखनऊ अग्निकांड में सामने आया चौंकाने वाला सच

15 मौतों के पीछे 10 साल पुरानी फाइल! लखनऊ अग्निकांड में सामने आया चौंकाने वाला सच

 

 

लखनऊ अग्निकांड: 15 जिंदगियां बुझीं, अब 10 साल पुराने फैसलों पर उठ रहे हैं सवाल

 

2016 में भवन को गिराने का आदेश हुआ था जारी, दो महीने बाद ही हुआ रद्द; अब 15 लोगों की मौत का कौन है जिम्मेदार

 

 

लखनऊ के अलीगंज में सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी। तीन मंजिला भवन में लगी आग ने 15 युवकों की जान ले ली, जबकि 9 लोग घायल हैं और उनका इलाज चल रहा है। हादसे के बाद पूरा शहर गमगीन है। इस बीच एक के बाद एक ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं, जो इस त्रासदी को सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि कई अनदेखियों और लापरवाहियों की कहानी बना रहे हैं।

 

बेसमेंट में लगी थी पहले आग

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक आग सबसे पहले भवन के भूतल पर स्थित पेट क्लिनिक के आसपास लगी थी। कुछ ही देर में आग और धुआं पूरे भवन में फैल गया। अंदर मौजूद लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। धुएं के बीच कई लोग इमारत में फंस गए।

हादसे के दौरान सामने आई एक घटना हर किसी को भावुक कर रही है। आग में फंसे एक युवक ने अपने पिता को फोन कर के कहा, “पापा, यहां आग लग गई है, मुझे बचा लीजिए।” लेकिन मदद पहुंचने से पहले ही आग ने सब कुछ खाक कर दिया।

 

मशक्कत के बाद बिल्डिंग में पहुंचे

घटना के बाद राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया। कुल 24 लोगों को अस्पताल पहुंचाया गया, जिनमें से 15 को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। बचाव अभियान देर रात तक जारी रहा। मौके पर पहुंचे उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने बताया कि दमकल कर्मियों को भवन के अंदर पहुंचने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। भारी धुएं के कारण बचाव दल ने पड़ोस के मकान की दूसरी मंजिल की दीवार तोड़कर अंदर पहुंचने का रास्ता बनाया।

प्रारंभिक जांच में आग लगने की वजह एसी डक्ट में आई तकनीकी खराबी मानी जा रही है। हालांकि अंतिम कारण जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

 

प्रधानमंत्री ने जताया दुख

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हादसे पर दुख व्यक्त करते हुए मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। साथ ही पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित कर सात दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगी गई है। प्रधानमंत्री ने भी घटना पर शोक जताते हुए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये की सहायता देने की घोषणा की है।

रक्षा मंत्री व लखनऊ के सांसद, राजनाथ सिंह ने भी इस घटना को हृदयविदारक बताते हुए मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की।

 

अवैध निर्माण को लेकर थी शिकायते

लेकिन हादसे के बाद अब चर्चा सिर्फ आग की नहीं हो रही, बल्कि उस भवन की भी हो रही है जिसमें यह दुर्घटना हुई। जांच में सामने आया है कि इसी भवन के खिलाफ करीब दस साल पहले अवैध निर्माण को लेकर ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आदेश जारी हुआ था, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

करीब 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाले इस भवन का मानचित्र 20 अगस्त 2014 को आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था।

हालांकि बाद में भवन में अनधिकृत निर्माण की शिकायतें सामने आने लगीं। इसके बाद एलडीए ने भवन मालिक वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या 08/2016 दर्ज किया। जांच के बाद 10 मई 2016 को अवैध निर्माण के खिलाफ ध्वस्तीकरण का आदेश भी पारित कर दिया गया।

लेकिन कहानी यहीं बदल जाती है। ध्वस्तीकरण का आदेश जारी होने के दो महीने के भीतर, 5 जुलाई 2016 को उसे निरस्त कर दिया गया। अब यही फैसला सवालों के घेरे में है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर वह आदेश वापस क्यों लिया गया? अगर उस समय कार्रवाई हो जाती, तो क्या आज 15 लोगों की जान बच सकती थी?

सूत्रों के अनुसार निर्माण के दौरान एलडीए की ओर से नोटिस भी जारी किए गए थे, लेकिन न तो निर्माण रोका गया और न ही कोई प्रभावी कार्रवाई हुई। इसके बाद वर्षों तक भवन में व्यावसायिक गतिविधियां चलती रहीं। जांच में यह भी सामने आया है कि इस दौरान कई शिकायतें हुईं, फाइलें चलीं और आदेश भी दिए गए, लेकिन उनका असर दिखाई नहीं दिया।

 

अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका

अब जब इस हादसे में 15 लोगों की जान चली गई है, तो जिम्मेदारी तय करने की मांग तेज हो गई है। एलडीए की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि वर्ष 2014 से 2026 के बीच इस क्षेत्र में करीब 30 अधिकारी, इंजीनियर, जोनल अधिकारी और विहित प्राधिकारी तैनात रहे। अब जांच एजेंसियां इन सभी की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं।

फिलहाल मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और एसआईटी अपनी जांच में जुटी हुई है। लेकिन जिन परिवारों ने इस हादसे में अपने परिजन खो दिए, उनके लिए यह सिर्फ एक जांच का विषय नहीं है। उनके मन में एक ही सवाल है-अगर समय रहते कार्रवाई हुई होती, तो क्या आज उनके अपने जिंदा होते।

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