संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस: सामाजिक न्याय, उत्तराखंड घटनाएं और विपक्ष के सवाल

नई दिल्ली: संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान विपक्ष की ओर से कई गंभीर मुद्दे उठाए गए। वक्ताओं ने सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार, पर्यावरण से जुड़े मामलों और उत्तराखंड की चर्चित घटनाओं का उल्लेख किया।
उनका कहना था कि देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ रही घटनाएं सरकार के दावों से अलग तस्वीर पेश करती हैं और इन पर विस्तार से चर्चा जरूरी है।
कविता से शुरुआत, सवालों पर जोर
भाषण की शुरुआत शायरी से की गई—
कुछ ना कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न,
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है।
इसके बाद कहा गया कि राष्ट्रपति के भाषण के दौरान जहां सरकार की उपलब्धियों की चर्चा हो रही थी, वहीं कई राज्यों से परेशान करने वाली खबरें सामने आ रही थीं।
उत्तराखंड और अंकिता भंडारी मामला
उत्तराखंड की युवती अंकिता भंडारी का उल्लेख करते हुए कहा गया कि आज भी लोग इस मामले में कथित वीआईपी की पहचान को लेकर सवाल पूछ रहे हैं।
कोटद्वार में एक बुजुर्ग को बचाने वाले युवक के खिलाफ दर्ज एफआईआर का जिक्र करते हुए पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल उठाए गए।
अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों पर टिप्पणी
- बरेली में खाली घर में नमाज़ पढ़ने पर कार्रवाई का मामला।
- क्रिसमस की तैयारी कर रहे ईसाइयों पर केस दर्ज होने के आरोप।
- जम्मू-कश्मीर में नीट परीक्षा से जुड़े कॉलेज की मान्यता रद्द किए जाने को लेकर विवाद।
पर्यावरण और अतिक्रमण हटाने के मुद्दे
छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल में पेड़ों की कटाई से आदिवासी समुदाय पर पड़ रहे असर की बात कही गई।
- मध्य प्रदेश के बैतूल में एक सामाजिक कार्यकर्ता के घर और स्कूल पर कार्रवाई।
- वाराणसी की दालमंडी इलाके में सड़क चौड़ीकरण के लिए दुकानों को हटाने का मुद्दा।
नेहरू और आइंस्टीन का संदर्भ
अपने संबोधन में वक्ताओं ने जवाहरलाल नेहरू का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका नाम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ ऐतिहासिक संदर्भों में लिया जाता रहा है।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन इतिहास में दिए गए योगदानों पर बहस संतुलित होनी चाहिए।
समय सीमा और कार्यवाही
बहस के दौरान सभापति ने यह भी बताया कि कांग्रेस पार्टी अपने निर्धारित समय से अधिक बोल चुकी है, जिसके बाद वक्ताओं को अपनी बात संक्षेप में समाप्त करने के निर्देश दिए गए।