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वो प्रधानमंत्री जिसने हमेशा भारत को दिखाई आंख, आखिर क्यों बनी रहीं विवादों से खालिदा ज़िया की पहचान?

कैद, हमले और सत्ता की लड़ाई……पाकिस्तान में नजरबंद रहीं, प्रधानमंत्री बनीं तो भारत विरोध की पहचान बनीं

 

1971 के मुक्ति संग्राम से लेकर सत्ता के शिखर तक, खालिदा जिया का जीवन संघर्ष, टकराव और विवादों से भरा रहा

बांग्लादेश की राजनीति में एक लंबा और असरदार दौर अब इतिहास बन चुका है। जिस नाम ने दशकों तक सत्ता, संघर्ष, विरोध और सत्ता से बाहर रहते हुए भी राजनीति को दिशा दी, वही नाम अब सिर्फ यादों में रह गया है। बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख बेगम खालिदा जिया का मंगलवार तड़के ढाका में निधन हो गया। वे 80 वर्ष की थीं। पिछले कई वर्षों से खालिदा जिया गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं। सीने में संक्रमण, लिवर और किडनी की बीमारी, डायबिटीज, गठिया और आंखों की तकलीफ ने उनकी हालत लगातार कमजोर कर दी थी। बीते करीब 20 दिनों से वे वेंटिलेटर पर थीं। मंगलवार सुबह करीब 6 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके परिवार और पार्टी नेताओं ने उनके निधन की पुष्टि की।

गृहिणी से प्रधानमंत्री तक का सफर

खालिदा जिया का जन्म 1945 में जलपाईगुड़ी (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) में हुआ था। उनके पिता इस्कंदर मजूमदार चाय के कारोबारी थे और परिवार की जड़ें बांग्लादेश के फेनी इलाके से जुड़ी थीं। शुरुआती जीवन पूरी तरह पारिवारिक रहा। राजनीति से उनका कोई सीधा नाता नहीं था। 1960 में उनका विवाह जियाउर रहमान से हुआ, जो उस समय पाकिस्तानी सेना में कैप्टन थे। 1971 के मुक्ति संग्राम में जियाउर रहमान ने पाकिस्तानी सेना से बगावत कर बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। लेकिन उसी दौर में खालिदा जिया को पाकिस्तानी सेना ने नजरबंद कर लिया था। वे जुलाई से दिसंबर 1971 तक कैद में रहीं और पाकिस्तान की हार के बाद रिहा हुईं।

पति की हत्या ने बदली जिंदगी

1978 में जियाउर रहमान ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की स्थापना की और बाद में देश के राष्ट्रपति बने। लेकिन 30 मई 1981 को चटगांव में एक सैन्य विद्रोह के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। यह वही पल था, जिसने खालिदा जिया की जिंदगी की दिशा बदल दी। पति की हत्या के बाद उन्होंने BNP की कमान संभाली और धीरे-धीरे खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया।

 

सत्ता तक पहुंच और दो कार्यकाल

खालिदा जिया पहली बार 1991 में प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद 2001 से 2006 तक उन्होंने दूसरा कार्यकाल पूरा किया। इस तरह वे दो बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं। उनके शासनकाल को सख्त फैसलों, राजनीतिक टकराव और आंदोलन के दौर के रूप में देखा जाता है। उनकी राजनीति हमेशा आक्रामक रही। सत्ता में रहते हुए भी और सत्ता से बाहर रहते हुए भी उन्होंने विपक्ष को खुली चुनौती दी। यही वजह रही कि समर्थकों ने उन्हें ‘आयरन लेडी’ कहना शुरू किया।

भारत को लेकर सख्त रुख

खालिदा जिया का भारत को लेकर रुख हमेशा टकराव वाला माना गया। वे बार-बार कहती थीं कि बांग्लादेश की संप्रभुता और सुरक्षा सर्वोपरि है। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने भारत को बांग्लादेश की जमीन से होकर पूर्वोत्तर राज्यों तक जाने का रास्ता देने का विरोध किया। उन्होंने 1972 की भारत-बांग्लादेश मैत्री संधि को आगे बढ़ाने का भी विरोध किया और इसे बांग्लादेश के लिए नुकसानदायक बताया। कई मौकों पर उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी देश को “किसी के प्रभाव में जाने” से बचाएगी। इसी वजह से कूटनीतिक हलकों में उनकी छवि एक भारत-विरोधी नेता की बनी रही, जबकि उनकी प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना को भारत का करीबी माना जाता रहा।

विवाद, हमले और संघर्ष

खालिदा जिया का राजनीतिक जीवन विवादों और खतरों से खाली नहीं रहा। 2015 में ढाका में मेयर चुनाव के दौरान उनके काफिले पर हमला हुआ। गोलीबारी और पत्थरबाजी में वे बाल-बाल बचीं। इसके अलावा उन्हें कई बार नजरबंद भी किया गया और लंबे समय तक जेल में भी रहना पड़ा। खालिदा जिया के दो बेटे थे। छोटे बेटे अराफात रहमान ‘कोको’ का 2015 में मलेशिया में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वे राजनीति से दूर रहते थे। बड़े बेटे तारिक रहमान अब उनकी राजनीतिक विरासत के मुख्य उत्तराधिकारी हैं। वे वर्तमान में BNP के कार्यवाहक अध्यक्ष हैं। 17 साल के निर्वासन के बाद तारिक रहमान 25 दिसंबर 2025 को अपनी पत्नी और बेटी के साथ बांग्लादेश लौटे। पार्टी के भीतर उन्हें भविष्य के सबसे बड़े नेता के रूप में देखा जा रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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