सरकार-RBI की बढ़ी चिंता: भारतीय रुपया गिरकर डॉलर के मुकाबले ₹90.41 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच गया है
एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बना रुपया: इस साल अब तक हुआ 5.5% कमजोर

जहां एक ओर भारत सरकार 4 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी का ढोल पीट रही है। वित्तीय वर्ष 25 -26 की सेकंड क्वार्टर में 8% की जीडीपी वृद्धि दर पर खुद को शाबाशी दे रही है वहीं एक मोर्चे पर लगातार सरकार बुरी तरह असफल हो रही है यह मोर्चा है रुपए की गिरती हुई कीमत। आज रुपया फिर नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। एक डॉलर की कीमत ₹90 पार हो गई है । रुपए की गिरती हुई स्थिति सरकार और आरबीआई दोनों के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है।
रिकार्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया
ताजा आंकड़ों के मुताबिक $1 के मुकाबले रुपए की कीमत 90.41 तक हो गई है। अगर हम आंकड़े को देखें तो रुपया इस साल एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी है। रुपया 2025 में अब तक 5.5% कमजोर हो चुका है । 1 जनवरी को डॉलर के तुलना में देखा जाए तो रुपया 85.70 के स्तर पर था। तमाम विशेषज्ञ इस बात का दावा कर रहे हैं कि इस बार आरबीआई का हस्तक्षेप रुपए को स्थिर करने के क्रम में काफी कम है। सोने की रिकॉर्ड ऊंची कीमतों ने आयात का बिल काफी अधिक कर दिया है। ट्रेड डील पर भी किसी स्पष्टता की वजह से रुपए की बिकवाली तेज हुई है।

कॉंग्रेस ने किया मोदी का पुराना वीडियों शेयर
रुपए की लगातार गिरती कीमतों पर कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियों सरकार को आड़े हाथों ले रही है । कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक पुराना वीडियो शेयर किया है जिसमें मोदी रुपए की गिरती स्थिति को लेकर केंद्र सरकार को कोस रहे थे वहीं समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने भी रुपए की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की है और सरकार पर प्रश्न खड़े किए हैं। डिंपल यादव ने कहा भारतीय जनता पार्टी की सरकार की नीतियों का सबसे बड़ा खामियाजा व्यापारियों को भुगतना पड़ रहा है।
रुपए गिरने की क्या है वजहें
व्यापार घाटा, करंट अकाउंट डेफिसिट का बढ़ना ,ट्रेड डील को लेकर स्पष्टीकरण और एफपीआई फ़्लो यह हमेशा से फैक्टर है जो रुपए की गिरावट में योगदान देते हैं। कुछ समय में ही आरबीआई की मौद्रिक नीति भी आने वाली है। रुपया कमजोर होने से भारत का आयात और अधिक महंगा हो जाएगा भारत विशेष तौर पर पेट्रोलियम, सोना चांदी ,ड्राई फ्रूट्स के लिए विदेशों पर निर्भर है रुपया कमजोर होने का सीधा सा मतलब अब इन चीजों के लिए हमें अधिक रुपए देने होंगे। हालांकि भारत एक प्रमुख सेवा निर्यातक देश भी है इसलिए आईटी कंपनियों और निर्यातकों को इससे फायदा होगा।
कब कब टूटा है रुपया
किसी भी देश की करेंसी का टूटना वहां की आंतरिक परिस्थितियों जिसमें खाद्य संकट ,गृह युद्ध जैसी परिस्थितियों शामिल हो सकती है। इनपर निर्भर हो सकता है। इसके अलावा वैश्विक स्थितियां जिसमें युद्ध, प्रमुख देशों से व्यापार व्यापारिक संबंध भी शामिल होते हैं। अगर हम रुपए के परिप्रेक्ष्य में देखे तो आजादी के बाद रुपये को पहला बड़ा झटका 1966 में लगा था । चीन और पाकिस्तान से युद्ध तथा सूखे के कारण अर्थव्यवस्था कमजोर हुई। इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय सहायता की शर्त पर तत्कालीन सरकार ने रुपये का 57.5% अवमूल्यन किया।
भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका तब लगा जब 1991 में जब भुगतान संतुलन संकट के कारण भारत के पास केवल तीन सप्ताह का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। इस आर्थिक संकट से निपटने के लिए, भारत ने उदारीकरण अपनाया और रुपया ₹21 से ₹26 पर फिसल गया। इसके बाद, 2008 की वैश्विक मंदी में विदेशी निवेशकों के पैसा निकालने से रुपया ₹51के पार चला गया। 2013 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की घोषणा से घबराकर निवेशकों ने फिर पैसा निकाला और रुपया ₹68.80तक टूट गया था ।
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