इंग्लैंड में दुनिया की पहली कमर्शियल LAES सुविधा की शुरुआत, भारत में भी शुरू हुआ पायलट प्रोजेक्ट — भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा को 24/7 स्थिर सप्लाई देने की तैयारी

हवा से बिजली बनाना कोई नई बात नहीं है। हम बचपन से पढ़ते आए हैं कि पवनचक्की या पवन टरबाइन हवा की ताकत से घूमते हैं और बिजली पैदा करते हैं। लेकिन अब टेक्नोलॉजी सिर्फ बिजली बनाने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि दुनिया इस बात पर भी काम कर रही है कि जब बिजली जरूरत से ज्यादा बन जाए तो उसे लंबे समय तक कैसे सुरक्षित रखा जाए। इसी दिशा में एक नई और तेज़ी से बढ़ती तकनीक सामने आई है। लिक्विड एयर एनर्जी स्टोरेज, जिसे छोटे रूप में LAES भी कहा जाता है।
क्या है, नई तकनीक
ये तकनीक हवा से सीधी बिजली नहीं बनाती बल्कि बिजली को स्टोर करने का नया और अनोखा तरीका है। इसे समझना मुश्किल नहीं है। जैसे हम फ्रिज में खाना ठंडा करके सुरक्षित रखते हैं, वैसे ही इस तकनीक में हवा को बहुत ज़्यादा ठंडा करके उसे तरल रूप में बदल दिया जाता है और बड़ी टंकियों में स्टोर किया जाता है।
इंग्लैंड के कैरिंगटन नाम के गांव में दुनिया की पहली कमर्शियल लेवल की LAES सुविधा बन रही है। यहां बनने वाली अतिरिक्त बिजली को इस तकनीक की मदद से लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाएगा और जब जरूरत होगी तब इसे फिर से बिजली में बदला जाएगा।
अब सवाल ये कि ये प्रक्रिया होती कैसे है?
जब बिजली की सप्लाई ज्यादा होती है और मांग कम, तब इस अतिरिक्त बिजली का उपयोग हवा को ठंडा करने में किया जाता है। हवा को करीब -196 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा किया जाता है। इतनी ठंड में आम हवा तरल रूप ले लेती है। इसे फिर अच्छी तरह इंसुलेटेड टैंकों में रखा जाता है ताकि यह दोबारा गैस में बदलकर फैल न जाए। जब बिजली की मांग बढ़ जाती है, तब इस तरल हवा को दोबारा गर्म किया जाता है। जैसे ही यह वापस गैस बनती है, यह लगभग 700 गुना तक फैलती है। यह फैलाव इतना ताकतवर दबाव पैदा करता है कि उससे टरबाइन घुमाई जा सकती है, और वही टरबाइन जनरेटर को चलाकर दोबारा बिजली बना देती है।
पवन ऊर्जा और लिक्विड एयर तकनीक का रिश्ता बहुत दिलचस्प है। हवा हमेशा एक जैसी नहीं चलती। कभी बहुत तेज़ चलती है, कभी बिल्कुल नहीं। ऐसे में पवन ऊर्जा से बिजली बनाना कभी ज्यादा और कभी कम होता है। इस अस्थिरता को संभालने में LAES बड़ी भूमिका निभा सकती है। जब हवा ज्यादा चल रही हो और जरूरत से ज्यादा बिजली बन रही हो, तब उसे स्टोर कर लिया जाएगा। और जब हवा कम हो या बिलकुल न चले, तब उसी स्टोर्ड एनर्जी को वापस ग्रिड में भेजा जा सकेगा। इस तरह ये तकनीक नवीकरणीय ऊर्जा को 24 घंटे इस्तेमाल करने लायक बनाती है।
सोलर और विंड एनर्जी
दुनिया आज साफ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ रही है। सोलर और विंड एनर्जी का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है स्टोरेज। कभी सूरज नहीं निकलता, कभी हवा नहीं चलती। ऐसे में बिना स्टोरेज के इनका भरोसेमंद इस्तेमाल संभव नहीं। इसलिए दुनिया भर में स्टोरेज के नए तरीकों पर रिसर्च हो रही है। किसी जगह लिथियम बैटरियों पर काम हो रहा है, कहीं पंप्ड हाइड्रो सिस्टम पर। लेकिन LAES को बड़ी उम्मीदों के साथ देखा जा रहा है क्योंकि ये पर्यावरण के लिए सुरक्षित है और इसे बड़े पैमाने पर स्थापित करना संभव है। भारत में भी इस तकनीक पर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। यूनाइटेड किंगडम की एक कंपनी ने महाराष्ट्र के पुणे में इसका पहला छोटा पायलट प्रोजेक्ट लगाने के लिए समझौता किया है। हालांकि अभी यह शुरुआती स्थिति में है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में इस तकनीक की बहुत जरूरत होगी।
दिल्ली के बाद अब मुंबई की बारी, ‘GRAP-4’ लागू! AQI रिकॉर्ड खतरनाक स्तर पर