Fact Check
Search

जम्मू-कश्मीर में लगातार बढ़ रहे विदेशी आतंकी ! क्या है ‘व्हाइट कॉलर’ मॉड्यूल ? जो बन रहा सबसे बड़ी चुनौती

कश्मीर में फिर बढ़ता खतरा – नए आतंकियों और नए मॉड्यूल की बड़ी चुनौती।

जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ समय से जो हालात बन रहे हैं, वह सिक्योरिटी एजेंसियों के लिए एक नई चिंता लेकर आए हैं। एक तरफ तो सुरक्षा बलों ने लगातार ऑपरेशन चलाकर पुराने नेटवर्क को काफी हद तक खत्म कर दिया था, लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तान समर्थित नए ग्रुप और नए तरीके फिर से सक्रिय हो रहे हैं। ज़मीन पर दिख रही शांति के पीछे एक ऐसी हलचल है जिसे सुरक्षा एजेंसियां बहुत गंभीरता से विचार रही हैं।

क्यों बढ़ रहा है खतरा?

खुफिया एजेंसियों ने हाल ही में जो अलर्ट जारी किया है, उसमें साफ संकेत हैं कि पाकिस्तान स्थित कई आतंकी संगठन सर्दियां पूरी तरह शुरू होने से पहले जम्मू-कश्मीर में अपनी गतिविधियां बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन ग्रुप्स की प्लानिंग अब पहले जैसी नहीं है। अब वे “मूविंग व्हीकल IED” यानी चलती गाड़ियों में विस्फोटक लगाकर दिल्ली जैसे बड़े सुसाइड ब्लास्ट के रास्ते तलाश रहे हैं। यह अलर्ट उस समय आया, जब इंटेलिजेंस को इस तरह के हमलों की प्लानिंग के पुख्ता इनपुट मिले। इसका मतलब साफ है। आतंकी संगठन पहले की तरह छोटे-मोटे हमलों से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाला मॉडल अपनाने की सोच रहे हैं।

आतंकी संख्या में अचानक उछाल

पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकियों की संख्या बढ़कर लगभग 131 हो गई है। इस संख्या में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 122 आतंकी पाकिस्तान से आए हुए हैं, जबकि केवल 9 स्थानीय हैं। कश्मीर घाटी में तो स्थानीय आतंकी सिर्फ 3 ही बचे हैं। इससे साफ होता है कि स्थानीय युवाओं की भर्ती लगभग बंद हो चुकी है, लेकिन पाकिस्तान और उसके समर्थित संगठन लगातार नए आतंकियों को सीमा पार से भेज रहे हैं।

पहले कितने सक्रिय थे?

मार्च 2025 के आखिर तक जम्मू-कश्मीर में कम संख्या में पाकिस्तानी आतंकी सक्रिय थे।
लेकिन पहलगाम हमले के बाद अचानक यह संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई। यही सबसे बड़ा संकेत है कि सीमा के उस पार से लगातार नए लड़ाकों को धकेला जा रहा है।

भर्ती बंद, फिर भी आतंकी कैसे बढ़े?

सबसे रोचक और चिंताजनक बात यही है कि स्थानीय युवाओं की भर्ती लगभग शून्य हो चुकी है। सुरक्षा बलों ने पिछले कुछ वर्षों में OGW यानी ओवरग्राउंड वर्कर और लोकल सपोर्ट नेटवर्क को तोड़ने में बड़ी सफलता पाई थी। यह J&K में आतंक के खिलाफ बड़ी जीत मानी जा रही थी। लेकिन अब जो ‘नया गैप’ बना है, उसे विदेशी आतंकी भर रहे हैं। ये लड़ाके भारत में पहले से मौजूद किसी नेटवर्क को नहीं जानते थे, इसलिए एजेंसियों के रडार पर नहीं थे। इसका फायदा उठाकर पाकिस्तान समर्थित ग्रुप्स जैसे TRF और PAFF भी अपनी पैठ बना रहे हैं। एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी के मुताबिक, घाटी में तो स्थानीय नेटवर्क को लगभग खत्म कर दिया गया, लेकिन नई विदेशी एंट्री इतनी तेज़ है कि उसकी मॉनिटरिंग बड़ी चुनौती बन गई है।

 

2023–24 में ऑपरेशन का क्या असर रहा?

सिक्योरिटी फोर्स के आधिकारिक डेटा के मुताबिक, 2024 में 61 आतंकी मारे गए। तो वहीं 2023 में 60 आतंकी ढेर किए गए। जिसमें 45 आतंकवादी जम्मू-कश्मीर के अंदर एनकाउंटर में मारे गए और 16 आतंकी LoC पर घुसपैठ की कोशिश के दौरान मार गिराए गए। इसके अलावा ,21 पाकिस्तानी आतंकी मारे गए। 28 आम नागरिक अपनी जान गंवा बैठे, वहीं एक तरफ़ 16 जवान भी शहीद हुए।

स्थिति क्यों बदली?

पिछले कुछ सालों में लागू “ज़ीरो टेरर पॉलिसी” और लगातार रेड-अरेस्ट के चलते आतंकवाद लगभग खत्म होता दिख रहा था। लेकिन “व्हाइट कॉलर” नेटवर्क का खुलासा और दिल्ली कार बम की घटना ने हालात बदल दिए।

 

यह ‘व्हाइट कॉलर’ मॉड्यूल आखिर है क्या?

पहलगाम हमले के बाद शुरू किए गए बड़े ऑपरेशनों में 12 टॉप आतंकियों को मार गिराया गया, जिनमें आधे पाकिस्तानी और आधे स्थानीय थे। लेकिन इसी दौरान खुलासा हुआ कि एक नया तरह का मॉड्यूल काम कर रहा है, यह लोग आतंकियों की तरह हथियार लेकर पहाड़ों में नहीं घूमते। ये आम नागरिकों, बिज़नेस, नौकरी या पढ़ाई की आड़ में समाज में घुल जाते हैं पैसों, तकनीक, लॉजिस्टिक्स और प्लानिंग के जरिए आतंकी गतिविधियों को सपोर्ट करते हैं। इन्हें “व्हाइट कॉलर” इसलिए कहा जाता है। क्योंकि ये दिखने में अपराधी नहीं लगते, लेकिन आतंकी ऑपरेशन का ‘ब्रेन’ यही लोग बनते हैं।

चार राज्यों में फैला नेटवर्क

दिल्ली ब्लास्ट के बाद हुए आपरेशन में J&K, दिल्ली, हरियाणा और यूपी में फैले इस नेटवर्क पर काफी कार्रवाई हुई है। कई लोग पकड़े गए, कई जगह छापे पड़े और कई मॉड्यूल टूटे भी हैं। लेकिन अब भी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि इस नए मॉड्यूल की असली ताकत कितनी है और इनके पास कितने लोग हैं। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क पुराने आतंकियों जैसा नहीं है, जिन्हें पहाड़ों में या जंगलों में ट्रैक कर लिया जाता था। यह लोग शहरों, कस्बों, और यहां तक कि सरकारी-निजी सिस्टम के अंदर तक घुसपैठ कर सकते हैं, इसलिए इन्हें पकड़ना मुश्किल है।

Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

Leave a Comment

Your email address will not be published.