चार दशक की राजनीति, कई उतार-चढ़ाव और शांत रणनीति इन्हीं दम पर एनडीए को दिलाई 200+ सीटों की जीत विकास और सामाजिक संतुलन ने बनाया नीतीश को बिहार की राजनीति का सबसे भरोसेमंद चेहरा
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बिहार की राजनीति में अगर किसी नेता ने अपनी पहचान मेहनत, धैर्य और शांत अंदाज़ से बनाई है, तो वह नाम नीतीश कुमार का ही है। उन्होंने न सिर्फ बिहार की तस्वीर बदली, बल्कि समाज और राजनीति दोनों को ही प्रभावित किया है। यही वजह है कि 2025 के चुनाव में भी एनडीए ने उनकी अगुवाई में 200 से ज़्यादा सीटें जीत लीं। अब वह दसवीं बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
कैसा रहा हैं, नीतीश कुमार का राजनीतिक सफ़र
नीतीश का राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा है। उनके करियर की शुरुआत हार से हुई थी। 1977 में उन्होंने हरनौत सीट से चुनाव लड़ा और हार गए। 1980 में फिर वही नतीजा मिला। लगातार दो बार हारने के बाद वे इतने निराश हुए कि मन में ठान लिया कि अगर तीसरी बार चुनाव हारे तो राजनीति छोड़ देंगे। लेकिन किस्मत ने इस बार उनका साथ दिया और 1985 में वह जीत गए। इसी जीत ने उनके लंबे राजनीतिक सफर का दरवाज़ा खोला। विधायक बनने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। चार साल बाद वह लोकसभा पहुंचे और राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा। 1990 में वीपी सिंह की सरकार में उन्हें कृषि और सहकारिता मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया। यह उनके लिए बड़ा मौका था और उन्होंने इसे साबित भी किया।
साल 1994 में पकड़ी अलग राह
साल 1994 में उन्होंने लालू प्रसाद यादव से अलग होकर अपनी राह बनाने का फैसला किया। जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर उन्होंने समता पार्टी बनाई। दो साल बाद समता पार्टी बीजेपी के साथ आई और बिहार में 6 सीटें जीतकर एक नए राजनीतिक समीकरण की शुरुआत की। यह गठबंधन आगे चलकर बिहार की राजनीति की सबसे बड़ी धुरी बना।
साल 2000 में उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, हालांकि यह कार्यकाल सिर्फ सात दिन चला। इसके बाद 2005 में उन्होंने फिर सत्ता संभाली और इस बार पूरे कार्यकाल को मजबूती से निभाया। यह वह दौर था जब बिहार में बड़े पैमाने पर बदलावों की शुरुआत हुई।

17 साल पुराना रिश्ता
2013 में उन्होंने बीजेपी से 17 साल पुराना रिश्ता तोड़ा और अपने दम पर आगे बढ़ने का फैसला किया। यह वही समय था जब उन्होंने भाजपा के 11 मंत्रियों को पद से हटा दिया। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू के प्रदर्शन ने उन्हें फिर मुश्किल में डाल दिया। नतीजों की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया।
2015 में वे नया गठबंधन बनाकर लौटे और चौथी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन यह अध्याय लंबा नहीं चला। कुछ ही महीनों में उन्होंने फिर इस्तीफा दिया और महागठबंधन से अलग हो गए। उसी दिन वह दोबारा एनडीए में शामिल हुए और छठी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह उनके राजनीतिक कौशल की एक और मिसाल थी।
साइलेंट किलर क्यों कहा गया
2020 में वह सातवीं बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन राजनीतिक उठापटक यहीं नहीं रुकी। 2022 में उन्होंने एक बार फिर BJP से नाता तोड़ लिया और महागठबंधन के साथ आ गए। इस तरह वे आठवीं बार मुख्यमंत्री बने। फिर 2024 में एक बार फिर उन्होंने गठबंधन बदला और एनडीए में लौट आए। 2025 के चुनाव में उन्होंने इतिहास रचते हुए शानदार जीत दिलाई।
यह सफर बताता है कि नीतीश राजनीति के ऐसे खिलाड़ी हैं जो मौके को समझते हैं, हवा का रुख पहचानते हैं और सही समय पर अपनी चाल चलते हैं। उनके विरोधी भी कहते हैं कि वह “साइलेंट किलर” की तरह काम करते हैं। कम बोलते हैं लेकिन फैसला ऐसा लेते हैं कि पूरा खेल बदल जाता है। नीतीश की पृष्ठभूमि हमेशा उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा रही है। उनका जन्म 1951 में पटना जिले के बख्तियारपुर में हुआ। पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और आयुर्वेदिक वैद्य भी। नीतीश ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बिजली विभाग में काम भी किया, लेकिन राजनीति उनके खून में थी। शुरुआती दिनों में वह जेपी आंदोलन से जुड़े और वहीं से उनकी राजनीतिक सोच बनी।
दो दशक पहले ऐसा क्या हुआ
उनकी राजनीति को समझना है तो बिहार के दो दशक पीछे जाना होगा। उनकी पूरी राजनीति “विकास” और ” सामाजिक न्याय” के इर्द-गिर्द घूमती रही। उन्होंने महिलाओं को हिम्मत दी, लड़कियों को साइकिल, यूनिफॉर्म और पढ़ाई के लिए नए मौके दिए। महिला सशक्तिकरण को उन्होंने योजनाओं से आगे बढ़ाकर ज़मीनी हकीकत में बदला। इसी का परिणाम है कि बिहार की महिलाओं में उनका अटूट भरोसा है।
अति पिछड़े वर्ग, दलित समाज और कमजोर वर्गों को उन्होंने पहली बार राजनीतिक केंद्र में लाया। जीविका दीदी योजना ने हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया। गांवों की महिलाओं ने पहली बार अपनी आर्थिक स्वतंत्रता महसूस की। शराबबंदी का फैसला थोड़ा विवादित जरूर रहा, लेकिन महिलाओं ने इसे खुलकर समर्थन दिया और आज भी उन्हें इसका श्रेय देती हैं।

सोशल इंजीनियरिंग का रहा कमाल
नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग का मॉडल भी बड़ा अनोखा रहा। कुर्मी और कोइरी समुदाय को उन्होंने एक साथ जोड़ा, जिसे बिहार में लव-कुश समीकरण के नाम से जाना जाता है। साथ ही मुसलमानों को भी उन्होंने अपने साथ जोड़े रखा। उनके व्यवहार में कभी किसी समुदाय के प्रति कटुता नहीं दिखी। यही वजह है कि उन्हें बिहार में सबसे संतुलित और धर्मनिरपेक्ष चेहरा माना जाता है। ऊपर से, उन्होंने सवर्ण समाज को भी अपने साथ रखा। उनकी राजनीति समावेशी रही।सबको जगह देने वाली, सबको जोड़कर चलने वाली। शायद यही वजह है कि लोग कहते हैं, “नीतीश सबके हैं।”
महिलाओं को 10 हजार रुपए की सहायता, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, बिजली सड़कों का विस्तार, स्कूली शिक्षा में सुधार। इन सारी नीतियों का असर जमीन पर सीधे दिखा। लोगों में विकास की एक नई उम्मीद जगी। यह भी सच है कि BJP के साथ उनका तालमेल कई मौकों पर उनके लिए फायदेमंद साबित हुआ। नीतीश के अनुभव और नेटवर्क के साथ मोदी की लोकप्रियता ने मिलकर मजबूत राजनीतिक आधार बनाया।
दसवें कार्यकाल का शपथ ग्रहण
आज, जब फिर से वे अपने दसवें कार्यकाल की ओर बढ़ रहे हैं, तो साफ दिखता है कि बिहार का एक बड़ा हिस्सा अब भी उन पर भरोसा करता है। राजनीति में शायद ही कोई दूसरा नेता हो जिसने इतने उतार-चढ़ाव देखे हों और फिर भी सत्ता का केंद्र बना रहा हो। नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। पटना के गांधी मैदान में उन्होंने शपथ ली। उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, यूपी के सीएम योगी आदित्यानथ समेत एनडीए के सभी दिग्गज नेता स्टेज पर मौजूद थे।
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