राज्यपाल द्वारा बिल लटकाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! बिल रोकने का अधिकार नहीं!
विपक्षी दलों द्वारा संचालित राज्यों में अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि राज्यपाल विधानसभा से पारित बिलों पर हस्ताक्षर करने में अनावश्यक देरी करते हैं। इस विवाद के बीच, गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि राज्यपाल किसी भी बिल को अनिश्चितकाल तक रोककर नहीं रख सकते।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
यह मामला तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच खींचतान से जुड़ा था, जहां कई विधेयक महीनों तक लंबित पड़े रहे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के तहत राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प हैं:
- बिल को मंजूरी देना,
- बिल को दोबारा विचार हेतु विधानसभा में भेजना,
- या बिल को राष्ट्रपति के पास भेजना।
अदालत ने कहा कि बिल को अनिश्चितकाल रोककर रखना संवैधानिक प्रक्रिया के खिलाफ है और इससे राज्य सरकार के सुचारू संचालन में बाधा उत्पन्न होती है।
समयसीमा को लेकर भी कोर्ट का बयान
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल पर बिल पर हस्ताक्षर करने की कोई सख्त समयसीमा नहीं लगाई जा सकती, क्योंकि यह शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का उल्लंघन होगा।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि—
“यदि राज्यपाल जानबूझकर देरी कर रहे हैं, तो सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।”
अप्रैल 2024 में भी सुप्रीम कोर्ट यह कह चुका है कि राज्यपाल के पास ‘वीटो पावर’ नहीं होती।
राष्ट्रपति के सवालों के बाद बढ़ी थी तनातनी

इस मामले में राष्ट्रपति ने भी अदालत के पहले आदेश पर चिंता जताते हुए कुछ स्पष्टीकरण मांगे थे। इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 पर विस्तृत सुनवाई हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति को भेजे गए बिलों पर निर्णय तीन महीने के भीतर लिया जाना चाहिए, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित न हो।
पांच जजों की बेंच ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया कि—
“बिलों को एकतरफा तरीके से रोकना भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ है।”
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 200 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना बिल रोकना न केवल राज्य सरकार के अधिकारों का हनन है, बल्कि संविधान की भावना के भी विरुद्ध है।
यह फैसला केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक संतुलन को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय उन विवादों को हमेशा के लिए शांत कर सकता है, जो राज्यपालों द्वारा बिलों को लंबित रखने को लेकर अक्सर उठते रहे हैं।