कश्मीरी पंडितों की ‘मातृभूमि’ की मांग को नई रफ्तार — Y4PK का बड़ा अभियान 2026 से शुरू

कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन को 35 साल से अधिक हो चुके हैं। एक पूरी पीढ़ी राहत शिविरों में ही बड़ी हो गई—कई लोग अपना घर-आंगन तक नहीं देख पाए। अब इसी दर्द और दशकों पुराने संघर्ष को आवाज़ देने के लिए यूथ फॉर पनुन कश्मीर (Y4PK) ने एक बड़ा अभियान घोषित किया है, जिसका नाम है — “महा अभियान आह्वान 2026”।
कब और कहां से शुरू होगा अभियान?
यह अभियान 16 जनवरी 2026 को जगती कैंप, जम्मू से शुरू होगा। जगती वह स्थान है जहां सबसे अधिक संख्या में विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार रहते हैं। यह स्थान 35 साल के संघर्ष, दर्द और मजबूरी का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
35 साल का इंतज़ार
प्रेस कॉन्फ्रेंस में Y4PK के चेयरमैन राहुल कौल ने कहा कि अब समय आ गया है जब कश्मीरी पंडितों की “मातृभूमि” की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूती से रखा जाए।
“यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व, हमारी पहचान और सुरक्षित वापसी की लड़ाई है।”
उन्होंने यह भी कहा कि यह अभियान “सभ्यतागत गोलबंदी” है—समुदाय को एक दिशा, एक आवाज़ और एक लक्ष्य में जोड़ने की बड़ी पहल।
जगती कैंप को ही क्यों चुना गया?
जगती भारत में सबसे बड़ा कश्मीरी पंडित पुनर्वास केंद्र है। 1990 के बाद आतंकवाद के कारण हजारों परिवार यहां आकर बसे।
यह केवल एक कैंप नहीं, बल्कि कश्मीरी पंडितों के पलायन का जीवंत प्रतीक है। इसलिए अभियान की शुरुआत यहीं से की जा रही है, ताकि संदेश स्पष्ट जाए—कि समुदाय अब भी एकजुट है और सुरक्षित वापसी की मांग पहले से ज्यादा मजबूत है।
अभियान में क्या-क्या होगा?
Y4PK ने स्पष्ट किया कि यह सिर्फ एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक लंबा राष्ट्रीय आंदोलन होगा। इसमें:
- देशभर के कश्मीरी पंडित परिवारों को जोड़ा जाएगा
- युवा संगठनों और सामाजिक संस्थाओं को शामिल किया जाएगा
- रैलियां और संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे
- जागरूकता अभियान चलेंगे
- केंद्र सरकार तक ठोस मांगें पहुंचाई जाएंगी
संगठन का उद्देश्य है कि यह मुद्दा केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित न रहे, बल्कि भारत और दुनिया में इसकी आवाज पहुंचे।
पनुन कश्मीर की पुरानी मांग — आखिर है क्या?
पनुन कश्मीर आंदोलन वर्षों से यह मांग करता रहा है कि घाटी में हिंदुओं के लिए एक अलग, सुरक्षित मातृभूमि बनाई जाए—जहां कश्मीरी पंडित बिना डर के रह सकें और अपनी संस्कृति, भाषा, परंपराओं और धार्मिक स्थलों को सुरक्षित रख सकें।
उनका कहना है:
“हम किसी की जमीन छीनना नहीं चाहते, हम बस अपनी पहचान वापस चाहते हैं।”
“हम वापस जाना चाहते हैं” — समुदाय का दर्द
कई बुजुर्ग अब भी कहते हैं:
“हम वापस जाना चाहते हैं, लेकिन अपने बच्चों के साथ और सुरक्षित माहौल में।”
उनके गांव, मंदिर, घर और जमीनें वर्षों से या तो कब्जे में हैं या खंडहर बन चुकी हैं। नई पीढ़ी ने अपनी मातृभूमि केवल कहानियों में सुनी है।
सरकार से क्या अपेक्षा है?
संगठन ने सरकार से अपील की है कि:
- विस्थापितों की सुरक्षित वापसी का रोडमैप तैयार किया जाए
- एक सुरक्षित, संरक्षित क्षेत्र की स्थापना पर विचार किया जाए
- कश्मीरी पंडितों की मांगों को राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता दी जाए
Y4PK का कहना है कि अब समय आ गया है जब सरकार, समाज और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस ऐतिहासिक मुद्दे को गंभीरता से सुने।