छोटे सरकार ‘ की दास्तान – गांव की गलियों से विधानसभा तक, अब अदालत की चौखट पर अनंत सिंह

बिहार राज के राज नेता और राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं जिनका असर सत्ता से भी ज़्यादा जनता की ज़ुबान पर रहता है। उन्हीं में एक नाम हैं, अनंत कुमार सिंह, जिन्हें लोग प्यार से ‘छोटे सरकार’ कहकर बुलाते हैं। कभी गांव के सादे माहौल से निकलकर विधानसभा तक पहुंचे अनंत सिंह आज फिर सुर्खियों में हैं। वजह है उनके खिलाफ लगातार बढ़ते आपराधिक मामले और ताज़ा गिरफ्तारी। यह कहानी उस इंसान की है जिसने सत्ता, संघर्ष और विवाद सबको बहुत करीब से देखा।
शुरुआती ज़िंदगी – गांव का लड़का जिसने ताक़त हासिल की
अनंत सिंह का जन्म 5 जनवरी 1967 को बिहार के पटना ज़िले के नदवां गाँव में हुआ। वे भूमिहार जाति से आते हैं और बचपन से ही जिद्दी स्वभाव के थे इसी स्वभाव लिए जाने भी जाते थे। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने इलाके की राजनीति और दबंगई दोनों की ओर रहा। बताया जाता है कि 90 के दशक में उनका नाम स्थानीय झगड़ों और छोटे-मोटे विवादों में आने लगा, और यहीं से ‘बाहुबली’ नाम की शुरुआत हुईं।
‘छोटे सरकार’ जानें जाते थे
साल था 2005 उन दिनों अनंत सिंह ने पहली बार राजनीति में कदम रखा। JDU के टिकट पर उन्होंने मोकामा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की। उस दौर में नीतीश कुमार और अनंत सिंह की जोड़ी को अजेय माना जाता था। 2010 में भी वे फिर से जीतकर विधानसभा पहुंचे। लेकिन धीरे-धीरे पार्टी के अंदर मतभेद बढ़ने लगे। अनंत सिंह की स्वतंत्र छवि, दबंग स्टाइल और विवादों ने नीतीश कुमार से उनकी दूरी बढ़ा दी। 2015 में उन्होंने JDU से नाता तोड़ लिया और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे। बात यहीं खत्म नहीं हुई, फिर वे 2020 में RJD के टिकट पर जीत हासिल की, जिसके बाद लोग समझ गए और उन्होंने यह भी साबित कर दिया, कि उनकी पकड़ इलाके में अब भी मज़बूत है।

नीलम देवी
राजनीति में जब अनंत सिंह पर गिरफ्तारी और जेल के साये मंडराने लगे, तब उनकी पत्नी नीलम देवी ने मोर्चा संभाला। उन्होंने मोकामा से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इस तरह राजनीति का परिवारिक विस्तार हुआ और “छोटे सरकार” की ताक़त बनी रही, भले ही अनंत जेल में रहे हों।
आरोप
अगर बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं की बात होती है तो अनंत सिंह का नाम सबसे ऊपर आता है। उनके खिलाफ कई गंभीर मामले दर्ज हैं। चुनावी हलफनामे के अनुसार, उनके ऊपर 38 से ज़्यादा आपराधिक मामले हैं, जिनमें हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और धमकी जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
इन मामलों के बावजूद उनका राजनीतिक ग्राफ नीचे नहीं गिरा। मोकामा में उनका पदवी मज़बूत बना रहा। कुछ लोग उन्हें इलाके का रखवाला मानते हैं तो कुछ लोग उनसे डरते और कांपते।
AK-47 केस
2019 में अनंत सिंह के घर से पुलिस ने छापा मारकर AK-47 राइफल, 22 जिंदा कारतूस और दो हैंड ग्रेनेड बरामद किए। इसके बाद उनके खिलाफ UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत मामला दर्ज हुआ, जो आम अपराधों से कहीं ज़्यादा गंभीर माना जाता है। उस वक्त वे फरार हो गए थे, बाद में दिल्ली कोर्ट में आत्मसमर्पण किया और बिहार पुलिस की कस्टडी में भेजे गए। इस केस ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं। यहां तक कि, मीडिया ने उन्हें “AK-47 वाला विधायक” तक कह दिया।

Dularchand Yadav हत्या मामला
नवंबर 2025 में अनंत सिंह एक बार फिर चर्चा में आए जब पटना पुलिस ने उन्हें दुलारचंद यादव हत्या मामले में गिरफ्तार किया। FIR के मुताबिक, पुरानी रंजिश और आपसी राजनीतिक संघर्ष इस हत्याकांड की जड़ में बताए गए। पुलिस का दावा है कि अनंत सिंह के करीबी लोग इस वारदात में शामिल थे, हालांकि खुद अनंत सिंह ने सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। यह मामला फिलहाल जांच चल रही हैं।
कोर्ट-कचहरी की दौड़ और जनता की राय
अनंत सिंह का राजनीतिक सफर अदालतों और चुनावी मंचों के बीच झूलता रहा है। कभी जेल से प्रचार करना, तो कभी अदालत में पेशी के बाद समर्थकों का स्वागत। यह उनकी ज़िंदगी का आम हिस्सा बन गया है। अदालतों ने कई बार सख्ती दिखाई, कई बार राहत दी, लेकिन विवाद उनका पीछा नहीं छोड़ सके।
जनता की राय दो हिस्सों में बंटी है , कुछ लोगों का मानना हैं कि अनंत सिंह अपने इलाके में विकास और सुरक्षा लाए, जबकि अन्य लोग कहते है कि डर और अपराध ने राजनीति को गंदा किया है। यही द्वंद्व उन्हें बिहार की राजनीति का सबसे चर्चित चेहरा बनाता है।
संपत्ति और रसूख
चुनावी दस्तावेज़ों के अनुसार, अनंत सिंह और उनके परिवार के पास कई करोड़ रुपये की संपत्ति है। दस्तावेज बताती हैं कि उनकी कुल संपत्ति लगभग 35–40 करोड़ रुपये के आसपास है। इसमें जमीन-जायदाद, गाड़ियाँ और अन्य निवेश शामिल हैं। इसी आर्थिक ताक़त के साथ उनका सामाजिक रसूख और भी बढ़ा, जिससे वे अपने विरोधियों पर भारी पड़ते रहे।
‘छोटे सरकार’ की छवि
मोकामा और आस-पास के गांवों में आज भी उनका नाम लेते ही लोग दो प्रतिक्रियाएँ देते हैं, कुछ मुस्कुराते हैं, कहते हैं “हमरा नेता है”, तो कुछ धीरे बोलते हैं, “साहब से बच के रहना।” यही दोहरी छवि उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है।
कई स्थानीय लोग बताते हैं कि अनंत सिंह का प्रभाव सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा; उनके दखल से झगड़े सुलझे, पंचायतों के फैसले हुए और कभी-कभी डर के चलते कोई विरोध नहीं करता। शायद इसी वजह से उन्हें “छोटे सरकार” कहा गया। एक ऐसा व्यक्ति जो अपने इलाके में सरकार से भी ज़्यादा ताक़तवर माना जाता है।

आगे क्या
2025 की गिरफ्तारी के बाद अब देखना होगा कि अदालत क्या फैसला देती है। अगर वे निर्दोष साबित होते हैं, तो यह उनकी राजनीति में नई जान फूँक देगा, और अगर सज़ा होती है तो मोकामा की सीट पर फिर नीलम देवी या किसी करीबी का नाम उभरेगा। बिहार की राजनीति में बाहुबल और सत्ता का रिश्ता पुराना है। अनंत सिंह उस दौर की निशानी हैं जब जनता का भरोसा ताक़त और असर में था, न कि सिर्फ़ नारे और घोषणाओं में। आज जब राजनीति बदल रही है, तब भी “छोटे सरकार” की कहानी लोगों के ज़ेहन में गूंजती है। एक ऐसे नेता की, जिसने सबकुछ पाया, मगर विवादों से कभी आज़ादी नहीं।
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