जनता भी कई बार जाति या दबदबे के आधार पर वोट देती है। इस बार फर्क बस इतना है, वही पुराने चेहरे, बस अब दूसरी पीढ़ी के नाम से मैदान में हैं!

बिहार की राजनीति में बाहुबलियों का प्रभाव धनबल और बाहुबल पर चलता रहा है। चुनावी रण के मैदान में वही पुराने नाम या उनके वारिस सामने आ जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे बिना बाहुबलियों या उनके नेटवर्क के चुनाव जीतना किसी भी पार्टी के लिए नामुमकिन हो गया हो। इस बार भी विधानसभा चुनाव में वही चेहरों का दबदबा दिख रहा है। बस चेहरे कुछ बदले हैं, पीढ़ी नई है।
राजनीति में बाहुबलियों की जड़ें
बिहार में बाहुबल की राजनीति की शुरुआत 80 के दशक में मानी जाती है। उस दौर में वीर महोबिया, सरदार कृष्णा और वीर बहादुर सिंह जैसे लोगों ने बंदूक और दबदबे के बल पर चुनाव जीतना शुरू किया। पहले ये लोग नेताओं को जीताने का काम करते थे, लेकिन धीरे-धीरे खुद नेता बन गए। यही परंपरा अब उनके बेटे, बेटियों और पत्नियों के रूप में आगे बढ़ रही है।
बिहार की राजनीति पहले जनबल पर टिकी थी, फिर धीरे-धीरे धनबल और बाहुबल पर केंद्रित हो गई। आज हालत यह है कि हर पार्टी को जीतने वाला चेहरा चाहिए, चाहे उसका बैकग्राउंड कैसा भी हो।
RJD – बाहुबलियों का पारंपरिक ठिकाना
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) हमेशा से बाहुबलियों की मजबूत राजनीतिक जमीन रही है। इस बार भी पार्टी ने कई पुराने बाहुबली परिवारों पर भरोसा जताया है।
- दानापुर से रीतलाल यादव – एक बार फिर टिकट पर मैदान में हैं। उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, लेकिन उनके इलाके में पकड़ आज भी बरकरार है।
- रघुनाथपुर से ओसामा शहाब – मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे, अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभाल रहे हैं।
- मोकामा से वीणा देवी – बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी, RJD के टिकट पर उतर रही हैं।
- लालगंज से शिवानी शुक्ला – बाहुबली मुन्ना शुक्ला की बेटी, पहली बार चुनावी मैदान में हैं।
- वारिसलीगंज से अनीता देवी – अशोक महतो की पत्नी, जिन्हें एक बार फिर टिकट मिला है।
- रुपौली से बीमा भारती – जिनके पति अवधेश मंडल को कोसी क्षेत्र का बड़ा बाहुबली माना जाता है।
- रघुनाथपुर से ओसामा शहाब – सुरेंद्र यादव के पुत्र हैं, जो सात बार विधायक रह चुके हैं।
RJD की रणनीति साफ है — अपने पुराने बाहुबली नेटवर्क को परिवार की अगली पीढ़ी के ज़रिए जिंदा रखना।
JDU – अनंत सिंह से चेतन आनंद तक
जनता दल (यूनाइटेड) ने भी इस चुनाव में कई बाहुबली या उनके परिजनों को टिकट दिया है।
- मोकामा से अनंत सिंह – जिन्हें ‘छोटे सरकार’ कहा जाता है, लंबे समय से इस सीट पर प्रभाव बनाए हुए हैं।
- नवीनगर से चेतन आनंद – बाहुबली आनंद मोहन के बेटे, जो पहले शिवहर से विधायक रहे हैं।
- नवादा से विभा देवी – राजबल्लभ यादव की पत्नी, इस बार JDU टिकट पर मैदान में हैं।
- बेलागंज से मनोरमा देवी – जिन्होंने हाल ही में उपचुनाव में RJD प्रत्याशी को हराया था।
- मटिहानी से राजकुमार सिंह – कभी लोजपा से जीते थे, अब जदयू से उम्मीदवार हैं।
- रुपौली से शंकर सिंह – पिछली बार निर्दलीय जीत दर्ज की थी, अब जदयू के टिकट पर उतर रहे हैं।
इनमें से ज्यादातर नाम वही हैं, जो पहले कभी अपराध की दुनिया से जुड़े रहे हैं, या फिर ऐसे लोगों के परिवार का हिस्सा हैं जिनका बिहार की राजनीति में लंबे समय से दबदबा है।
भाजपा और लोजपा
भाजपा और चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी इस होड़ में शामिल हैं।
- तरारी से प्रशांत विशाल – बाहुबली सुनील पांडे के बेटे। लोकसभा चुनाव के बाद हुए उपचुनाव में बीजेपी ने इन्हें उम्मीदवार बनाया था और जीत भी मिली थी। इस बार फिर बीजेपी ने इन्हें उम्मीदवार बनाया है।
- शाहपुर से राकेश ओझा – दिवंगत विश्वेश्वर ओझा के पुत्र। विश्वेश्वर ओझा की हत्या के बाद बीजेपी ने पहली बार उनके बेटे को टिकट दिया है।
- ब्रह्मपुर से हुलास पांडे – सुनील पांडे के छोटे भाई और इलाके के प्रभावशाली चेहरे। LJP (रामविलास) ने इन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है।
इन उम्मीदवारों के जरिए दोनों दलों ने भी यह संकेत दे दिया कि वे बाहुबल के समीकरण को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
बाहुबल का नेटवर्क और जातीय समीकरण
बिहार की राजनीति में बाहुबल का ताना-बाना जाति और इलाके से गहराई से जुड़ा है। बाहुबली अपने समुदाय के वोट को एकजुट करते हैं, और यही उनके प्रभाव की असली ताकत होती है। राजनीतिक दलों की मजबूरी है कि वे उन चेहरों को टिकट दें जो अपने इलाके में ‘वोट दिलाने वाले’ माने जाते हैं। जनता भी अक्सर जातीय आधार पर वोट देती है, जिससे बाहुबलियों की ताकत बनी रहती है।
दूसरी पीढ़ी की धमक
आपको बता दें, 2025 के चुनाव में सबसे दिलचस्प बात यह है कि बाहुबलियों की दूसरी पीढ़ी अब सीधे राजनीति में उतर चुकी है। पहले जो लोग जेल के भीतर से चुनावी समीकरण तय करते थे, अब उनके बेटे-बेटियाँ सोशल मीडिया पर प्रचार करते नज़र आ रहे हैं।
“राजनीति में बाहुबलियों की वापसी नहीं, बल्कि नया रूप देखने को मिल रहा है,” सुनील पांडेय कहते हैं। “इस बार अधिकांश उम्मीदवार बाहुबली के वारिस हैं — आनंद मोहन के पुत्र, सूरजभान सिंह की पत्नी, सुनील पांडेय के पुत्र, मुन्ना शुक्ला की बेटी, तस्लीमुद्दीन के पुत्र सभी मैदान में हैं।”
क्या बिहार बाहुबल की राजनीति से मुक्त हो पाएगा?
सवाल यही है कि क्या बिहार की राजनीति कभी बाहुबल और धनबल से मुक्त हो सकेगी? हर पार्टी साफ राजनीति की बात तो करती है, लेकिन टिकट बांटने के वक्त वही पुराने समीकरण काम आते हैं। जनता भी कई बार जाति या दबदबे के आधार पर वोट देती है। इस बार फर्क बस इतना है, वही पुराने चेहरे, बस अब दूसरी पीढ़ी के नाम से मैदान में हैं।