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‘डिजिटल अरेस्ट’ वालों की खैर नहीं! क्या सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला बढ़ाएगा केंद्र और राज्यों के बीच तकरार ?

डिजिटल अरेस्ट

‘डिजिटल अरेस्ट’ वालों की खैर नहीं! क्या सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला बढ़ाएगा केंद्र और राज्यों के बीच तकरार ?

डिजिटल अरेस्ट

देशभर में तेजी से बढ़ रहे “डिजिटल अरेस्ट” (Digital Arrest) घोटालों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने इस मामले पर बड़ा फैसला लिया है। कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि इन मामलों की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी जा सकती है।

 

सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमलया बागची की बेंच ने कहा कि “डिजिटल अरेस्ट” जैसे नए साइबर अपराधों का नेटवर्क देशभर में फैला हुआ है, इसलिए इनकी जांच एक समान ढंग से होनी चाहिए। कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि डिजिटल अरेस्ट से जुड़े साइबर अपराधों की सभी एफआईआर की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को सौंपी जाए।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन मामलों की जांच केंद्रीय एजेंसियों को सौंपने पर विचार किया जा रहा है ताकि अपराधियों को सजा मिल सके और पीड़ितों को न्याय मिले।

 

क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’ ?

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट एक नया साइबर अपराध है, जिसमें ठग पुलिस, सीबीआई या सरकारी अधिकारी बनकर वीडियो कॉल या फोन पर लोगों को धमकाते हैं। वे पीड़ितों को यह विश्वास दिलाते हैं कि उनके खिलाफ कोई केस चल रहा है, और पैसे देने पर “मामला रफा-दफा” करने का झांसा देते हैं। कोर्ट ने इस प्रवृत्ति को “खतरनाक और गंभीर समस्या” बताते हुए कहा कि देशव्यापी जांच जरूरी है। हालांकि, बेंच ने यह भी कहा कि अंतिम आदेश से पहले राज्यों को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाएगा।

 

सीबीआई पहले से जांच कर रही कुछ मामले

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सीबीआई पहले से ही कुछ “डिजिटल अरेस्ट” मामलों की जांच कर रही है और इसमें गृह मंत्रालय के साइबर क्राइम डिवीजन की मदद ली जा रही है।

 

इस पर बेंच ने पूछा कि क्या सीबीआई के पास पूरे देश में ऐसे मामलों को संभालने की क्षमता और संसाधन हैं? जजों ने पोंजी स्कीम्स जैसे पुराने वित्तीय घोटालों का जिक्र करते हुए कहा कि “ऐसे मामलों की संख्या बहुत अधिक होने पर सीबीआई पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।”

 

क्या होती है पोंजी स्कीम?

पोंजी स्कीम एक निवेश धोखाधड़ी होती है, जिसमें नए निवेशकों से जुटाए गए पैसे से पुराने निवेशकों को भुगतान किया जाता है। जब नए निवेशक आना बंद कर देते हैं, तो यह योजना ध्वस्त हो जाती है और लोग अपनी पूंजी खो देते हैं।

 

साइबर अपराधों के बढ़ते आंकड़े

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2022 से 2024 के बीच डिजिटल अरेस्ट और साइबर धोखाधड़ी के मामले तीन गुना बढ़े हैं, जबकि ठगे गए पैसों की राशि 21 गुना बढ़ी है।

  • 2022: 39,925 मामले, 91.14 करोड़ रुपये का नुकसान
  • 2024: 1,23,672 मामले, 19,35.51 करोड़ रुपये का नुकसान
  • 2025 (जनवरी–फरवरी): 17,718 मामले, 210.21 करोड़ रुपये की ठगी

अंबाला केस से शुरू हुई कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट ने यह सख्त रुख अंबाला के एक वरिष्ठ नागरिक दंपति के मामले में अपनाया। ठगों ने उनसे कोर्ट और एजेंसियों के फर्जी आदेश दिखाकर 1.05 करोड़ रुपये हड़प लिए थे। बेंच ने कहा, “यह कोई मामूली अपराध नहीं है, बल्कि एक संगठित आपराधिक गिरोह का नेटवर्क है। ऐसे मामलों की प्रभावी जांच के लिए केंद्र और राज्य पुलिस के बीच समन्वय जरूरी है।”

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