दिवाली की ‘सस्ती’ गन बनी मौत का बम! सिर्फ़ ₹100 की ‘कार्बाइड गन ‘ कैसे छीन रही सैंकड़ों लोगों की आँखें

दिवाली पर कई शहरों के बाजारों में “देसी कार्बाइड गन” तेजी से बिकी है। यह नया चलन सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो देखकर लोग इसे मनोरंजन का साधन समझकर खरीद रहे हैं। कीमत मात्र 100 से 200 रुपए के बीच है, लेकिन यह सस्ती गन अब गंभीर दुर्घटनाओं की वजह बन रही है। अब तक मध्यप्रदेश के भोपाल और नर्मदापुरम सहित कई जिलों में 23 लोगों की आंखें और चेहरे झुलस चुके हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यह वस्तु कोई खिलौना नहीं बल्कि रासायनिक विस्फोटक है, जो पलभर में आंखों की रोशनी छीन सकता है।
कैसे काम करती है यह गन?
पीवीसी पाइप और घरेलू लाइटर से बनी यह ‘कार्बाइड गन’ रासायनिक विस्फोटक उपकरण है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस गन में कैल्शियम कार्बाइड नामक पदार्थ डाला जाता है। जब इसमें पानी डाला जाता है, तो इससे एसीटिलीन गैस बनती है। नीचे लगे लाइटर से आग लगते ही गैस का दबाव तेजी से बढ़ता है और गन के आगे से जोरदार धमाका होता है। लोग इसे बच्चों के खिलौने की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन जब यह तुरंत नहीं फटती, तो बच्चे इसके मुंह के सामने झांकते हैं। उसी समय गैस का दबाव बढ़ने से ब्लास्ट होता है और आंखों को सीधी चोट लगती है।
अस्पतालों में बढ़ी इमरजेंसी
भोपाल के विभिन्न अस्पतालों में बीते रविवार शाम 5 बजे से सोमवार सुबह 9 बजे के बीच ऐसे 11 मरीज पहुंचे। गांधी मेडिकल कॉलेज, एम्स भोपाल और जेपी अस्पताल ने दिवाली की रात के लिए ट्रॉमा, नेत्र और बर्न यूनिट की संयुक्त टीम तैनात कर दी है। डॉक्टरों ने बताया कि यह पहली बार है जब दिवाली के मौके पर आंखों से जुड़ी इतनी गंभीर चोटों के मामले एक साथ दर्ज किए गए हैं। सबसे अधिक प्रभावित बच्चे 8 से 12 वर्ष की उम्र के हैं।
शरीर पर क्या असर डालती है एसीटिलीन गैस?
डॉ. एस.एस. कुबरे, गांधी मेडिकल कॉलेज के नेत्र विशेषज्ञ, बताते हैं कि एसीटिलीन गैस सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाती है। यह गैस नर्वस सिस्टम और मस्तिष्क पर असर डालती है, जिससे ऑक्सीजन की कमी, सिरदर्द, चक्कर, नींद आना, याददाश्त में कमी, मानसिक भ्रम और मस्तिष्क में सूजन जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बनती है।
भोपाल में खुली बिक्री, हर दिन 100 से ज्यादा गन बिक रहीं
कोलार इलाके के रहने वाले एक युवक अजय को सुभाष एक्सीलेंस स्कूल के पास यह गन बेचते हुए पकड़ा गया। उसने बताया कि वह रोज़ करीब 80 से 100 गन बेचता है। इन्हें तैयार करने में पीवीसी पाइप, गोंद और लाइटर जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, शहर में कई छोटे समूह अलग-अलग जगहों पर इस गन की बिक्री कर रहे हैं।
सोशल मीडिया से फैला ट्रेंड, वीडियो देखकर बाजार से खरीद रहे हैं गन
युवा बता रहे हैं कि पहले इस गन का वीडियो सोशल मीडिया पर देखा था। वहां इसे मज़ेदार पटाखा बताकर दिखाया गया था। जब उन्होंने इसे बाजार में बिकते देखा, तो खुद भी खरीदने पहुंच गए। सोशल मीडिया पर वायरल रील्स के कारण बड़ी संख्या में बच्चे और युवा यह गन खरीद रहे हैं।
स्थायी रूप से जा सकती है आंखों की रोशनी
डॉ. हेमलता यादव के अनुसार, इस गन के धमाके से कॉर्निया और आइरिस पर गंभीर चोट पहुंचती है। कई मामलों में स्टेम सेल्स नष्ट हो जाते हैं, जिससे कॉर्निया स्थायी रूप से खराब हो सकता है। कुछ मरीजों में रेटिना सूजन और ऑप्टिक नर्व डैमेज की स्थिति भी सामने आई है। उन्होंने कहा कि “यह मामूली खिलौना नहीं है, थोड़ी-सी लापरवाही किसी की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए छीन सकती है।”
फलों को पकाने में भी उपयोग होता है कैल्शियम कार्बाइड
डॉक्टरों ने बताया कि यही रसायन कई व्यापारी फलों को जल्दी पकाने के लिए भी अवैध रूप से इस्तेमाल करते हैं। केले, पपीते और आम जैसे फलों को बाजार में जल्दी बेचने के लिए कैल्शियम कार्बाइड से पकाया जाता है, जिसमें अक्सर आर्सेनिक और अन्य कैंसरकारक रसायन की मिलावट होती है। रिसर्च बताती है कि ऐसे रसायन वाले फल खाने से त्वचा जलना, खुजली, सूजन, और दीर्घकाल में कैंसर या हृदय रोग जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
सुरक्षा के लिए सुझाव
- फलों को पकाने के लिए एथिलीन आधारित प्राकृतिक तकनीकें अपनाई जाएं।
- कैल्शियम कार्बाइड के उपयोग की पहचान और निगरानी के लिए नई तकनीकें विकसित हों।
- लोगों और व्यापारियों को इसके दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक किया जाए।
प्रशासन इस पदार्थ की बिक्री और उपयोग पर सख्त कार्रवाई करे।
दिवाली पर धूमधाम और मस्ती के बीच “देसी कार्बाइड गन” और कार्बाइड, जो आसानी से सभी जगह पर मिल जाती है, यह एक ऐसा ट्रेंड बन गया है, जो ज़िंदगी भर की चोट दे सकता है। कुछ रुपये की सस्ती मस्ती, किसी की आंखों की रोशनी और जीवन की खुशियां हमेशा के लिए छीन सकती हैं।
आखिर रामगोपाल वर्मा ने क्यों कर दी दिवाली-गाजा तुलना ? सोशल मीडिया पर बयान से भारी हंगामा!