“विधर्मी के साथ जाए तो टांगे तोड़ दो!” — लव जिहाद पर साध्वी प्रज्ञा का विवादित बयान, जाने क्या है मामला
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में पूर्व सांसद और बीजेपी नेता साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के एक विवादित बयान ने politische बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि अगर बेटी माता-पिता की बात न माने और किसी दूसरे धर्म के लड़के के साथ चलने की कोशिश करे तो परिवार को सख्ती दिखानी चाहिए। उनके अनुसार पहले समझाना और डांटना जरूरी है, लेकिन अगर वह फिर भी न माने तो “ज़रूरी हो तो उसकी टांगें तोड़ देने” जैसे कड़े कदम उठाने तक पीछे नहीं हटना चाहिए — इस बयान ने सार्वजनिक और राजनीतिक दोनों ही स्तरों पर आलोचना और समर्थन दोनों को जन्म दिया है।

सोशल मीडिया और सार्वजनिक प्रतिक्रिया
साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर सोशल मीडिया पर विभाजित प्रतिक्रियाएँ आईं। कई लोगों और महिला संगठन ने उनके बयान की कड़ी निंदा की और इसे महिलाओं के व्यक्तिगत अधिकारों और आज़ादी के खिलाफ बताया। आलोचकों का कहना है कि किसी भी स्थिति में हिंसा या शारीरिक सजा का प्रस्ताव रखना गैरकानूनी और अनैतिक है।
वहीं उनके समर्थक इस बयान को पारिवारिक अनुशासन और संस्कारों की रक्षा से जोड़कर देख रहे हैं। उनके समर्थकों का तर्क है कि माता-पिता को अपने बच्चों के भविष्य और सम्मान की चिंता करनी चाहिए और कभी-कभी कड़वी सलाह या सख्ती आवश्यक हो सकती है।
कानूनी और सामाजिक निहितार्थ
कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि किसी भी नागरिक के खिलाफ हिंसात्मक कृत्य, चाहे वह परिवार का सदस्य ही क्यों न हो, भारतीय दंड संहिता और अन्य संबंधित कानूनों के अंतर्गत अपराध है। महिला अधिकार संगठनों ने सरकार और स्थानीय प्रशासन से अपील की है कि सार्वजनिक प्रतिनिधियों द्वारा ऐसे बयान न दिए जाएँ और अगर किसी ने हमला या हिंसा की बात की है तो उसकी स्पष्ट जांच और कार्रवाई हो।
बयान का राजनीतिक असर
यह टिप्पणी केवल भोपाल तक सीमित नहीं रही — यह सोशल मीडिया पर वायरल होकर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है और चुनावी व राजनीतिक मोर्चे पर भी इसका असर देखा जा रहा है। विपक्ष ने इसे संवैधानिक मूल्यों और महिलाओं के अधिकारों के विरुद्ध बताया है, जबकि कुछ समर्थक इसे सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्य बचाने की बातें मानते दिखे।
नारी संगठन और सामुदायिक प्रतिक्रिया
कई महिला एवं नागरिक संगठनें साध्वी प्रज्ञा के बयान की निंदा करते हुए सख्त कार्रवाई की मांग कर रही हैं। उन्होंने कहा है कि परिवारों के भीतर हो रहे किसी भी विवाद का समाधान कानूनी और संवैधानिक ढंग से ही होना चाहिए, और किसी भी तरह की शारीरिक हिंसा को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।
स्थानीय नेताओं और प्रशासन ने भी संदेश दिया है कि कानून और सार्वजनिक व्यवस्था के दायरे में ही बात की जानी चाहिए। मामले की सामाजिक संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस और प्रशासन द्वारा किसी तरह की उत्तेजक गतिविधि पर नजर रखी जा रही है।