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मारिया मचाडो को मिला नोबेल, व्हाइट हाउस ने जतायी नाराज़गी! डोनाल्ड ट्रंप खुद को क्यों मानते हैं असली हक़दार?

डोनाल्ड ट्रंप की तमाम कोशिशों के बावजूद नोबेल शांति पुरस्कार पाने से पीछे रहें गए !

मारिया मचाडो को मिला नोबेल पुरस्कार

नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा हो चुकी है । इस साल का नोबेल शांति पुरस्कार वेनेजुएला की मारिया कोरिना मचाडो को मिला, जिन्होंने लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष किया।
ट्रंप खुद को बार-बार नोबेल पुरस्कार के लिए योग्य बताते रहे हैं। उनका दावा है कि उन्होंने दुनिया में कई जगह युद्ध रुकवाए, संघर्ष कम किए और लाखों लोगों की जान बचाई। लेकिन, 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के नतीजे आने के बाद भी ट्रंप का नाम विजेताओं में नहीं था।

व्हाइट हाउस ने जतायी नाराजगी

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने भी कहा कि “ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए, क्योंकि उन्होंने भारत-पाकिस्तान से लेकर इजरायल और ईरान जैसे देशों के बीच शांति स्थापित की है। उन्होंने कहा कि “ट्रंप ने अपने छह महीने के कार्यकाल में औसतन हर महीने एक शांति समझौता कराया।”

ट्रंप खुद को कई बार इस पुरस्कार के लिए नामांकित कर चुके हैं। पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने दावा किया कि उन्होंने ‘ सात अंतहीन युद्ध ‘ खत्म कर दिए हैं और इसलिए वे इस सम्मान के हकदार हैं।

कई देशों ने उन्हें नामित भी किया, लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि ट्रंप को यह प्रतिष्ठित सम्मान नहीं मिला? आइए जानते हैं कारण जो उनकी उम्मीदों के बीच दीवार बन गए।

नोबेल समिति ने क्यों नहीं दिया पुरस्कार?

नोबेल पुरस्कार समिति का मानना है कि यह सम्मान उन लोगों को दिया जाता है जो राष्ट्रों के बीच बंधुत्व और स्थायी शांति की दिशा में काम करते हैं। ट्रंप के कार्यकाल में उनके कदम कई बार इसके उलट रहे।

– शांति विरोधी विदेश नीति

ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से नाता तोड़ लिया, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर निकल गए, और हथियार नियंत्रण संधियों को तोड़ा। उन्होंने अपने सहयोगी देशों पर टैरिफ युद्ध छेड़ दिया, नाटो का मजाक उड़ाया और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को छोटा किया।

मारिया मचाडो

– नोबेल की राजनीति में अनुचित दबाव

समिति का मानना है कि नोबेल की मान्यता “मांगी नहीं जाती, कमाई जाती है।” जबकि ट्रंप ने इस पुरस्कार को एक मिशन की तरह ले लिया था। उन्होंने विदेशी नेताओं पर उन्हें नोमिनेट करने के लिए दबाव डाला और यहां तक कहा कि अगर नॉर्वे ने उन्हें नजरअंदाज किया तो उस पर टैरिफ लग सकता है।

– ओबामा से तुलना का जुनून

ट्रंप हमेशा बराक ओबामा की तुलना में खुद को बेहतर साबित करने की कोशिश करते रहे। उन्हें लगता था कि अगर ओबामा को 2009 में पुरस्कार मिला था तो वे उससे कहीं ज्यादा योग्य हैं। लेकिन नोबेल समिति ‘प्रतिशोध या तुलना’ पर नहीं, बल्कि असल योगदान पर ध्यान देती है।

– शांति को प्रचार का हथियार बना दिया

ट्रंप के अब्राहम समझौते, उत्तर कोरिया शिखर सम्मेलन और तालिबान वार्ताएँ ज़्यादा पीआर स्टंट लगती थीं। समिति ने कहा कि वे स्थायी शांति से ज़्यादा ‘ ‘ ‘सुर्खियों ‘ के लिए किए गए कदम थे।

– वैश्विक व्यवस्था को कमजोर किया

ट्रंप का नारा ‘America First’ अंतरराष्ट्रीय सहयोग के खिलाफ था। उन्होंने कई देशों के रिश्ते बिगाड़े और सहयोगी देशों से दुश्मनी मोल ली। नोबेल समिति के लिए यह असंभव था कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को सम्मानित करे जिसने वैश्विक व्यवस्था को कमजोर किया।

– विवादास्पद विरासत

ट्रंप की कुछ उपलब्धियाँ जैसे अब्राहम समझौता या कोसोवो इकोनॉमिक डील अच्छी मानी गईं, लेकिन ईरान परमाणु समझौते से हटना, चीन और उत्तर कोरिया के साथ तनाव बढ़ाना जैसे फैसलों ने उनके रिकॉर्ड को नकारात्मक बना दिया।

– व्यवहार और बयानबाज़ी ने भी नुकसान पहुँचाया

ट्रंप कई बार पुरस्कार को ‘धांधली’ कह चुके हैं। उन्होंने पिछली विजेताओं की आलोचना भी की। नोबेल समिति इस तरह के असंतुलित और आत्मकेंद्रित रवैये को पसंद नहीं करती।

मारिया मचाडो

– नोबेल सिर्फ नतीजों पर नहीं, मूल्यों पर आधारित है

नोबेल शांति पुरस्कार सिर्फ इस बात पर नहीं दिया जाता कि किसी ने कितने युद्ध रोके, बल्कि इस पर कि उसने कितनी ईमानदारी, सहानुभूति और नैतिकता से काम किया। ट्रंप का व्यवहार और राजनीति इन मूल्यों के विपरीत रही।

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति रहे हैं, जिन्होंने 2017 से 2021 तक कार्यकाल संभाला। वे एक बिजनेसमैन भी हैं। अपने कार्यकाल में उन्होंने बार-बार दावा किया कि उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को रोका है। हाल ही में उन्होंने कहा, “मैंने आठ युद्ध रोके हैं, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। लेकिन मैंने यह किसी पुरस्कार के लिए नहीं किया, बल्कि लोगों की जान बचाने के लिए किया।”

भारत-पाकिस्तान विवाद और ट्रंप के दावे

ट्रंप कई बार दावा कर चुके हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने 30 से ज़्यादा बार यह बात दोहराई कि उन्होंने दोनों देशों के बीच युद्ध रोकने में मदद की।

लेकिन, भारत ने इस दावे को पूरी तरह नकार दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा था कि “किसी भी देश के नेता ने भारत से ऑपरेशन ‘सिंदूर ‘ रोकने के लिए नहीं कहा।” डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को बार-बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उपयुक्त बताया, लेकिन समिति ने उनके बजाय उन लोगों को चुना जिन्होंने वास्तव में शांति, मानवता और लोकतंत्र के लिए संघर्ष दिया।

 

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Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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