केरल हाईकोर्ट ने वक्फ बोर्ड को फटकार लगाते हुए कहा — “कल को ताजमहल, लाल किला और हाईकोर्ट तक को वक्फ घोषित कर दिया जाएगा।
मुनंबम वक्फ भूमि विवाद में अदालत ने कहा कि बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी संपत्ति को वक्फ नहीं बताया जा सकता।
केरल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: “कल को ताजमहल, लाल किला और हाईकोर्ट तक को वक्फ घोषित कर दिया जाएगा” — मुनंबम वक्फ भूमि विवाद पर बड़ा फैसला
केरल में चल रहे मुनंबम वक्फ भूमि विवाद पर हाईकोर्ट ने वक्फ बोर्ड को कड़ी फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश एस. ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी. एम. की खंडपीठ ने कहा कि यदि संपत्तियों को बिना उचित प्रक्रिया के वक्फ घोषित करने की अनुमति दी गई, तो “कल को ताजमहल, लाल किला, विधानसभा भवन और यहां तक कि हाईकोर्ट की इमारत को भी वक्फ संपत्ति बताया जा सकता है।”
क्या है मुनंबम वक्फ भूमि विवाद?
मुनंबम (Munambam) में 4 एकड़ भूमि को लेकर यह विवाद शुरू हुआ। केरल वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह भूमि वक्फ संपत्ति है, जबकि इस भूमि पर पिछले कई दशकों से करीब 600 हिंदू और ईसाई परिवार रह रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने यह भूमि कानूनी रूप से खरीदी है और उनके पास सभी दस्तावेज मौजूद हैं।
दरअसल, 1902 में त्रावणकोर राजपरिवार ने यह भूमि 123 साल के पट्टे पर अब्दुल सत्तार सैद के परिवार को दी थी। बाद में 1950 में सैद के रिश्तेदार सिद्दीकी सैद ने यह भूमि कोझीकोड के फारुक कॉलेज को दान कर दी। उस समय 404.76 एकड़ था, जो समुद्री कटाव के कारण घटकर अब 135.11 एकड़ रह गया है।
अब वक्फ बोर्ड का दावा है कि 1950 में भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया था, जबकि स्थानीय निवासियों का कहना है कि न तो कॉलेज प्रबंधन ने कभी ऐसा दावा किया, और न ही दस्तावेज़ों में भूमि को वक्फ बताया गया था।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने वक्फ बोर्ड की कार्रवाई को “मनमानी और दुर्भावनापूर्ण” बताया। अदालत ने कहा —
“यदि न्यायपालिका ऐसे मनमाने वक्फ घोषणाओं को वैधता दे दे, तो कल को कोई भी इमारत — ताजमहल, लाल किला, विधानसभा भवन या स्वयं यह अदालत — वक्फ घोषित की जा सकती है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी प्रवृत्ति नागरिकों के संविधानिक अधिकारों पर हमला है —
अनुच्छेद 300A: संपत्ति के अधिकार का हनन
अनुच्छेद 19: व्यापार की स्वतंत्रता पर खतरा
अनुच्छेद 21: जीवन और आजीविका के अधिकार का उल्लंघन
“वक्फ” शब्द बना विवाद का कारण
वक्फ बोर्ड ने इस भूमि को वक्फ संपत्ति इसलिए घोषित कर दिया क्योंकि दस्तावेज़ के शीर्षक में “वक्फ” शब्द लिखा था। लेकिन अदालत ने कहा कि “वक्फ” बनने की कानूनी शर्तें पूरी नहीं थीं, इसलिए केवल शीर्षक के आधार पर संपत्ति को वक्फ नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की
“वक्फ बोर्ड की यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है। इतने वर्षों तक भूमि पर कोई दावा नहीं किया गया, लेकिन जब जमीन का व्यावसायिक मूल्य बढ़ गया, तब अचानक दावा किया गया।”
सरकार और आयोग की भूमिका
जब विवाद बढ़ा तो नवंबर 2024 में राज्य सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सी. एन. रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग गठित किया। यह आयोग लगभग 600 परिवारों के विरोध के बाद बना था।
वक्फ संरक्षण समिति ने इस आयोग को अदालत में चुनौती दी और कहा कि सरकार को वक्फ संपत्ति की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है।
मार्च 2025 में एकल पीठ ने आयोग को रद्द कर दिया, जिसके बाद सरकार ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की।
अब खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि फारुक कॉलेज को दी गई भूमि “दान पत्र” के तहत थी, वक्फनामा नहीं।
पिछली सभी कानूनी कार्यवाहियों में भी इसे दान पत्र ही माना गया था।
अदालत का मत
हाईकोर्ट ने कहा कि वह यह जांचने के लिए सक्षम है कि वक्फ घोषित करने की प्रक्रिया सही तरीके से — सर्वेक्षण, सुनवाई और जांच के माध्यम से — की गई थी या नहीं।
अदालत ने कहा —
“किसी संपत्ति को वक्फ घोषित करने की प्रक्रिया नागरिकों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है। इसलिए अदालत इस पर निगरानी रख सकती है।”