हरिहरपुर से शुरू हुई सुर-यात्रा काशी की गलियों से होते हुए विश्व मंच तक पहुंची।
प्रधानमंत्री मोदी ने दी श्रद्धांजलि।
काशी की गलियों से लेकर देश-विदेश के मंचों तक अपनी गायकी का जादू बिखेरने वाले सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र का निधन हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि ‘वे जीवनपर्यंत भारतीय कला और संस्कृति की समृद्धि के लिए समर्पित रहे।’
शुरुआती जीवन
3 अगस्त 1936 को उत्तर प्रदेश के हरिहरपुर गाँव (तत्कालीन आज़मगढ़ ज़िला) में जन्मे छन्नूलाल मिश्र बचपन से ही संगीत की लय में डूबे रहे। उनके पिता पंडित बद्री प्रसाद मिश्र स्वयं गायक थे, और दादा गुदई महाराज शांता प्रसाद तबला वादन के लिए प्रसिद्ध थे। छह वर्ष की आयु में उन्होंने पिता से संगीत की शिक्षा ली और नौ साल की उम्र में उस्ताद अब्दुल गनी खान से खयाल गायन सीखा।
काशी से जुड़ाव
मुजफ्फरपुर में शिक्षा और साधना के बाद अपेक्षित मान-सम्मान न मिलने से आहत होकर वे करीब चार दशक पहले वाराणसी आ गए। काशी ने उन्हें अपनाया और बनारस की ठुमरी-गायकी को उन्होंने नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। उनकी ठुमरी “अब तोसे नैना लागे” और भोजपुरी कजरी बनारसी अंदाज़ में आज भी गूंजती है।

छन्नूलाल मिश्र के प्रसिद्ध गीत –
1.राम कहानी
2.भवानी दयानी
3.शिव चालीसा
4.सुन्दरकाण्ड
5.सेजिया से सैयाँ रूठ गए
6.दुनिया दर्शन का है मेला
धार्मिक और सांस्कृतिक योगदान
पंडित छन्नूलाल मिश्र केवल मंचीय गायक ही नहीं रहे, बल्कि धार्मिक रचनाओं के माध्यम से भी घर-घर तक पहुँचे। विंधेश्वरी चालीसा, हनुमान चालीसा, शिव चालीसा और रामकथा के गायन ने उन्हें अपार लोकप्रियता दी। यहाँ तक कि फिल्मों आरक्षण और मोहल्ला अस्सी में भी उनकी आवाज़ सुनाई दी।
सम्मान और पुरस्कार
2000 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2010 – पद्मभूषण
वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के शीर्ष ग्रेड कलाकार रहे और संस्कृति मंत्रालय के सदस्य के रूप में भी कला की सेवा की।
आज उनके निधन की खबर से काशी शोक में डूबी है। मोहल्ले के लोग उन्हें याद करते हुए कह रहे हैं कि वे बेहद सरल और अपनत्व से भरे इंसान थे। उनका जाना केवल एक गायक का जाना नहीं है, बल्कि काशी की गायन परंपरा की एक अनूठी कड़ी का टूटना है। गंगा के घाटों से लेकर चौक की गलियों तक बस यही गूंज रही है—“काशी ने अपने स्वररत्न को खो दिया।