बिहार चुनाव से पहले राजद में पारिवारिक संकट गहराया। तेजप्रताप यादव ने अलग पार्टी बनाई, बहन रोहिणी भी सख्त रुख में।
क्या मतदाता परंपरा निभाएगा या बदलाव चुनेगा?
बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, लेकिन लालू यादव की पार्टी राजद इस समय पारिवारिक संकट से गुजर रही है। लालू यादव अब स्वास्थ्य कारणों से राजनीति में पहले जैसे सक्रिय नहीं हैं। भारतीय परंपरा में बड़ा बेटा उत्तराधिकारी माना जाता है, लेकिन राजद में छोटे बेटे तेजस्वी यादव को ही पार्टी का असली वारिस मान लिया गया है। यही बात तेजप्रताप यादव को रास नहीं आई और वे अब बगावत कर चुके हैं। तेजप्रताप को राजद से निकाल भी दिया गया है, और उन्होंने अपनी अलग पार्टी “जनशक्ति जनता दल” बना ली है। इसी बीच बहन रोहिणी आचार्य कभी तेजप्रताप के समर्थन में दिख रही हैं तो कभी तेजस्वी पर वार करती नजर आती हैं। तेजस्वी के खास माने जाने वाले संजय यादव को भी इस खींचतान की वजह माना जा रहा है।
दरअसल, पारिवारिक पार्टियों में ऐसा संकट कोई नया नहीं है। उत्तर प्रदेश की सपा, तमिलनाडु की डीएमके, महाराष्ट्र की शिवसेना या फिर तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति सब जगह यही कहानी रही है। जब तक संस्थापक मजबूत रहते हैं, परिवार और पार्टी एकजुट रहती हैं। लेकिन जैसे ही संस्थापक कमजोर पड़ते हैं, सत्ता और संपत्ति के बंटवारे की लड़ाई खुलकर सामने आ जाती है।
बिहार में आज जो राजद में हो रहा है, वही कभी समाजवादी पार्टी में मुलायम और शिवपाल बनाम अखिलेश के रूप में देखा गया था। महाराष्ट्र में भी बाला साहेब ठाकरे के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई हुई। यही हाल हरियाणा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी दिख चुका है।
राजद के भीतर ये खींचतान चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकती है। तेजप्रताप और रोहिणी का बागी रुख तेजस्वी की मुश्किलें बढ़ा सकता है। अब देखना होगा कि बिहार का मतदाता परंपरा निभाते हुए तेजस्वी को ही स्वीकार करता है या फिर बदलाव की तरफ रुख करता है।