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भगत सिंह जयंती विशेष : युवाओं के दिलों में ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ का नारा भरने वाले अमर शहीद

भगत सिंह, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

13 साल की उम्र से देशभक्ति की राह पर, जेल और फांसी तक, उनका जीवन प्रेरणा का प्रतिरूप

 

भारत की आज़ादी की लड़ाई में अगर किसी नाम ने युवाओं के दिलों में सबसे ज़्यादा जोश भरा तो वो नाम है – भगत सिंह। उनका जन्म 27 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव (आज का पाकिस्तान) में हुआ था। जब वह पैदा हुए, उसी समय उनके पिता और चाचा जेल में बंद थे। शायद इसलिए उनकी नसों में आज़ादी का खून बहता था। भगत सिंह एक सिख परिवार में जन्मे थे। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह ग़दर पार्टी से जुड़े थे। परिवार के इस माहौल का असर बचपन से ही उन पर पड़ा। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनकी सोच को पूरी तरह बदल दिया। घटना के अगले दिन वे खुद अमृतसर पहुँचे और वहाँ से मिट्टी लेकर लाए। जिसे उन्होंने जीवन भर अपने पास रखा। तभी, उन्होंने संकल्प लिया कि अंग्रेजों को भारत से निकालकर रहेंगे।

असहयोग आंदोलन से निराशा

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने उन्हें भी प्रेरित किया और वे पढ़ाई छोड़ आंदोलन में शामिल हो गए। लेकिन 1922 में चौरी-चौरा की हिंसा के बाद जब गांधी ने आंदोलन वापस लिया, तो भगत सिंह निराश हो गए। इसके बाद उन्होंने महसूस किया कि केवल अहिंसा से आज़ादी पाना मुश्किल है और उग्र क्रांति ही रास्ता है।

 

नौजवान भारत सभा और साथियों का साथ

लाहौर में उन्होंने “नौजवान भारत सभा” नाम का संगठन बनाया। यहाँ पर सुखदेव, राजगुरु और भगवती चरण जैसे साथी मिले। विवाह की बातें घर में होने लगीं तो भगत सिंह घर से भागकर कानपुर पहुँच गए। वहाँ गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आकर उन्होंने आंदोलन की राह और स्पष्ट कर ली।

लाला लाजपत राय की शहादत का बदला

1928 में साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और उनकी मौत हो गई। इस घटना ने भगत सिंह को झकझोर दिया। उन्होंने लाजपत राय की मौत का बदला लेने की ठानी और पुलिस अफसर सॉन्डर्स को गोली मार दी।

विधान सभा में बम और गिरफ्तारी

8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केन्द्रीय विधान सभा में बम फेंका। यह बम किसी को मारने के लिए नहीं था, बल्कि अंग्रेजी सरकार का ध्यान खींचने के लिए था। भागने की बजाय दोनों ने खुद गिरफ्तारी दी। यह उनका साहस ही था, कि अदालत में भी उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर बयान दिए।

साहित्यिक योगदान –

भगत सिंह केवल क्रांतिकारी ही नहीं थे, बल्कि एक लेखक और विचारक भी थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ –

1.मैं नास्तिक क्यों हूँ ।

2.जेल डायरी ।

3.समाजवाद और क्रांति पर अनेकों लेख ।

जेल, भूख हड़ताल और फांसी

जेल में रहते हुए भगत सिंह ने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए लंबी भूख हड़ताल की। 7 अक्टूबर 1930 को विशेष अदालत ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई। 24 मार्च 1931 को फांसी दी जानी थी, लेकिन अंग्रेज उनकी लोकप्रियता से डर गए और 23 मार्च को ही 7:30 बजे उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया।

भगत सिंह अमर नायक

“इंकलाब ज़िंदाबाद” उनका नारा बनकर आज भी गूंजता है। वे केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि लेखक और विचारक भी थे। उनकी जेल नोटबुक और पत्र आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं।

Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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