बिहार में मुस्लिम नेताओं की स्थिति – 17% आबादी, सिर्फ 19 विधायक, टॉप लीडरशिप में कमी
बीजेपी-आरजेडी-जेडीयू में मुस्लिम नेताओं की भूमिका पर एक नजर
बिहार में मुस्लिम आबादी 17% होने के बावजूद विधानसभा में सिर्फ 19 मुस्लिम विधायक हैं। जानिए बीजेपी, आरजेडी और जेडीयू में मुस्लिम नेताओं की भूमिका और टॉप लीडरशिप में कमी।
बिहार में हर पार्टी खुद को अल्पसंख्यकों का समर्थक बताती है। कांग्रेस हो, राजद हो या नई पार्टी जनसुराज सब कहते हैं कि वे मुसलमानों के हक़ में काम करेंगे। राहुल गांधी तो खुले मंच से बोलते हैं “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।” RJD तो खुद को मुसलमान और पिछड़ों की पार्टी मानती है। ईद पर उनकी इफ्तार पार्टी हमेशा चर्चा में रहती है। लेकिन जब टिकट बांटने की बारी आती है तो 17% आबादी आखिर कितना असर छोड़ पाती है।
बिहार विधानसभा में अभी सिर्फ 19 मुस्लिम विधायक हैं, जबकि आबादी करीब 17% है। इसमें सबसे ज्यादा 8 आरजेडी के, 4 कांग्रेस के और बाकी छोटे दलों के हैं। AIMIM ने 2020 में 5 सीटें जीती थीं लेकिन 4 विधायक आरजेडी में चले गए। अब केवल अख्तरुल ईमान ही पार्टी का चेहरा बचे हैं।

RJD के बड़े मुस्लिम नेताओं में अब्दुल बारी सिद्दीकी, शहनवाज आलम, इसराइल मंसूरी, शमीम अहमद और फात्मी है। कांग्रेस और CPI(ML) में भी कुछ मुस्लिम चेहरे हैं, लेकिन संख्या सीमित है।
JDU की हालत अलग है। उनके पास अभी एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है। वक्फ संशोधन बिल पर समर्थन देने से मुस्लिम नेताओं में नाराजगी भी बढ़ी। फिर भी नीतीश कुमार अपने अल्पसंख्यक नेताओं जैसे सलीम परवेज और इकबाल हैदर पर भरोसा करते हैं।
बीजेपी की छवि हिंदुत्व की पार्टी की है, लेकिन अल्पसंख्यक नेताओं में शाहनवाज हुसैन, साबिर अली और जमाल सिद्दीकी जैसे नाम चर्चा में रहते हैं। शाहनवाज हुसैन तो केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं और बिहार सरकार में भी अहम पदों पर रहे हैं।
आपको बता दें, कि बिहार में मुस्लिम आबादी वोट के लिहाज से बहुत अहम है। करीब 47 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर हार-जीत तय करते हैं। फिर भी टॉप लीडरशिप में मुस्लिम चेहरों की कमी साफ दिखती है।