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हिन्दुओं को जातियों में बांटने की कोशिश ,कर्नाटक में जातीय जनगणना पर बीजेपी

हिन्दुओं को जातियों में बांटने की कोशिश ,कर्नाटक में जातीय जनगणना पर बीजेपी

 

जातीय जनगणना

कर्नाटक में जातीय जनगणना आज से शुरू हो चुकी है, केंद्र सरकार द्वारा देश भर में जातीय जनगणना के ऐलान के बाद अब कर्नाटक में भी आज से जनगणना शुरू हो चुकी है। बिहार से शुरू हुई इस जातीय जनगणना का तो शुरुआत में काफी विरोध हुआ लेकिन बाद में राजनीतिक दल इसे कराने में सफल होते दिख रही है। सरकार के इस फैसले पर राजनीति गरम हो चुकी है। वहीं विपक्ष ने इस फैसले को हिंदुओं को बांटने वाला फैसला बताया है।

कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बताया की “यह जातीय जनगणना नहीं बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछले लोगों का पता लगाने के लिए एक सर्वेक्षण है”। पार्टी नेताओं का ऐसा कहना है की इस सर्वेक्षण से विभिन्न जातियों और उनके सामुदायिक समूहों और उनके संख्या का पता लग सकेगा जिससे उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे तौर पर मिल सके।

 

दोहरी जातियों के नाम छिपाए जाएंगे

 

राज्य के अधिकारियों ने बताया की 420 करोड़ रुपए के अनुमानित ये सर्वेक्षण वैज्ञानिक तरीके से कराया जाएगा, जिसके लिए हमने 60 प्रश्नों वाली प्रश्नावली होगी। इसी बीच कांग्रेस पार्टी के भीतर से जातियों की सूची को लेकर आलोचनाएं आई है कहा जा रहा है कि राज्य में कुछ ऐसी जातियां भी है जिनकी दोहरी पहचान है जैसे क़ुरुबा क्रिश्चियन, ब्राह्मण क्रिश्चियन,वोक्कालिगा क्रिश्चियन। आयोग ने इस बात का जवाब देते हुए कहा कि इन जातियों के नाम छिपाए जाएंगे, लेकिन उन्हें से सूची नहीं हटाया जाएगा।

 

जातियों की सूची का कोई कानूनी महत्व नहीं: मधुसूदन आर. नाइक

 

कर्नाटक राज्य के पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष आर. नाइक ने मीडिया को बताया कि सूची केवल गणना में मदद करने वाले लोगों के लिए बनाई गई है जिसका कोई कानूनी महत्व नहीं है। आगे बताते हुए कहा कि 22 सितंबर से ये सर्वेक्षण शुरू होने वाला है जिसकी पूरी तैयारी आयोग ने कर ली है।

 

भाजपा ने कहा हिन्दुओं को बांटने की साजिश

 

भाजपा ने कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह फैसला जल्दबाजी में कराई जा रही है जिससे हिंदुओं को जातियों में बाटा जा सके। उन्होंने सवाल करते हुए कहा कि “सरकार पहले ही जनगणना में जाति की गिनती करने की घोषणा कर चुकी है, तो इस जनगणना की क्या जरूरत है। सरकार ने 2015 में भी एक सामाजिक और शैक्षिक सर्वे किया था, जिसमें करीब 165.51 करोड़ रुपये खर्च हुए थे”, जिसे बाद में खारिज कर दिया गया था ।

 

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