गया टाउन विधानसभा सीट बिहार की राजनीति में भाजपा का गढ़ मानी जाती है।
प्रेम कुमार ने लगातार सात बार जीत दर्ज की है, लेकिन घटते वोट अंतर से भाजपा की चिंता बढ़ी है। 2025 चुनाव में यह सीट रोमांचक मुकाबले का गवाह बन सकती है।
गया। बिहार चुनावी माहौल में गया टाउन विधानसभा सीट फिर से चर्चा में है। यह सीट शहरी इलाके की पहचान रखती है और यहाँ वोटर जातीय समीकरणों के साथ-साथ विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी-बिजली, ट्रैफिक और रोजगार जैसे मुद्दों को ध्यान में रखकर वोट करते हैं। लंबे समय से यह सीट भाजपा के खाते में रही है और प्रेम कुमार इसका चेहरा बने रहे हैं। लेकिन लगातार घटते जीत के अंतर ने भाजपा को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
पिछले तीन चुनावों का हाल
गया टाउन सीट पर प्रेम कुमार का दबदबा साफ दिखता है।
- 2010 का चुनाव – भाजपा नेता प्रेम कुमार ने सीपीआई उम्मीदवार जलाल उद्दीन अंसारी को हराकर शानदार जीत दर्ज की। उन्हें करीब 54% वोट मिले और 28 हज़ार से अधिक वोटों से जीत मिली। यह चुनाव भाजपा के लिए खास रहा क्योंकि पूरे बिहार में तब भाजपा-जदयू गठबंधन मजबूत स्थिति में था। गया टाउन में भाजपा ने विपक्ष को बहुत पीछे छोड़ दिया।
- 2015 का चुनाव – इस बार महागठबंधन की लहर पूरे बिहार में चली। भाजपा को कई सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। लेकिन गया टाउन सीट पर प्रेम कुमार ने कांग्रेस प्रत्याशी प्रिय रंजन को हराया। जीत का अंतर घटकर 22 हज़ार रह गया, लेकिन लगातार छठी जीत दर्ज कर प्रेम कुमार ने यह साबित किया कि यहाँ उनकी पकड़ अब भी मजबूत है।
- 2020 का चुनाव – 2020 के चुनाव में प्रेम कुमार ने कांग्रेस उम्मीदवार अकौरी ओंकार नाथ को हराया। लेकिन इस बार अंतर और घट गया और जीत महज 12 हज़ार वोटों से मिली। यह उनकी लगातार सातवीं जीत थी। हालांकि, घटता अंतर भाजपा के लिए चेतावनी है कि विपक्ष धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है।
जातीय समीकरण
गया टाउन का चुनाव पूरी तरह जातीय और सामाजिक समीकरणों से प्रभावित रहता है।
- मुस्लिम मतदाता (18–20%) – इनकी संख्या यहाँ काफी है। आमतौर पर यह वोट भाजपा के खिलाफ जाता है और कांग्रेस या राजद जैसे दलों को फायदा पहुँचाता है।
- अनुसूचित जाति (SC – 16–17%) – इनका वोट किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़ा है। हालात और उम्मीदवार के आधार पर यह वोट बंटता रहा है।
- ओबीसी और ईबीसी मतदाता – यह वर्ग यहाँ सबसे बड़ी संख्या में है। प्रेम कुमार को लगातार इस वर्ग से अच्छा समर्थन मिलता रहा है और यही भाजपा की जीत का सबसे मजबूत आधार रहा है।
- सवर्ण मतदाता – ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत जातियां पारंपरिक रूप से भाजपा का समर्थन करती रही हैं।
यानी, मुस्लिम और एससी वोटरों की मौजूदगी के बावजूद भाजपा इस सीट पर मजबूत इसलिए रही क्योंकि ओबीसी-ईबीसी और सवर्णों का ठोस समर्थन उसके साथ रहा है।
वोटिंग पैटर्न
गया टाउन विधानसभा की राजनीति में एक खास पैटर्न पिछले तीन चुनावों से साफ झलकता है।
- 2010 में भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की और विपक्ष को करारी हार मिली।
- 2015 में पूरे राज्य में महागठबंधन का जोर था, लेकिन गया टाउन में भाजपा ने सीट बचा ली।
- 2020 में भाजपा जीती, लेकिन जीत का अंतर घटकर 12 हज़ार रह गया।
यह पैटर्न बताता है कि मतदाता भाजपा को लगातार मौका दे रहे हैं, लेकिन हर बार थोड़ा कम अंतर से। यानी मतदाताओं के बीच बदलाव की चाह धीरे-धीरे बढ़ रही है।
2025 का चुनाव : किसके लिए चुनौती, किसके लिए उम्मीद?
- भाजपा – प्रेम कुमार की लगातार सात जीत ने भाजपा को इस सीट पर अजेय बना दिया है। लेकिन घटते वोट अंतर को देखते हुए पार्टी को मुस्लिम, एससी और युवा वोटरों तक पहुँचना होगा। अगर भाजपा इन वर्गों को अपने पक्ष में कर पाती है, तो आठवीं बार जीतना मुश्किल नहीं होगा।
- कांग्रेस/महागठबंधन – कांग्रेस इस सीट पर लगातार दूसरे नंबर पर रही है। अगर वह मुस्लिम और एससी वोटरों को पूरी तरह एकजुट कर ले और ओबीसी-ईबीसी वोटों में भी सेंध लगा पाए, तो भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। महागठबंधन अगर नए चेहरे या नए मुद्दों के साथ मैदान में उतरे, तो मुकाबला और भी कड़ा हो सकता है।
अन्य दल – छोटे दलों का असर अब तक बहुत बड़ा नहीं रहा है। लेकिन अगर कोई तीसरा मजबूत उम्मीदवार सामने आया तो वोट बिखर सकते हैं और नतीजों में बड़ा उलटफेर संभव है।
मुद्दे और मतदाता
गया टाउन शहरी इलाका है, इसलिए यहाँ के मुद्दे भी शहरी हैं।
- सड़क और ट्रैफिक की समस्या – शहर की सड़कें और ट्रैफिक जाम बड़ी परेशानी है।
- सफाई और सीवरेज – शहरी मतदाता लगातार सफाई व्यवस्था की शिकायत करते हैं।
- पानी और बिजली की किल्लत – गर्मियों में पानी और बिजली की दिक्कत सबसे बड़ा मुद्दा बनती है।
- बेरोजगारी – युवा मतदाता रोजगार और अवसरों की कमी से सबसे ज्यादा परेशान हैं।
युवा और महिला मतदाता 2025 के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

गया टाउन विधानसभा पिछले तीन दशकों से भाजपा और प्रेम कुमार का गढ़ रही है। लगातार सात जीत इस बात का सबूत है। लेकिन वोटों का घटता अंतर साफ इशारा करता है कि जनता बदलाव पर भी विचार कर रही है। अब देखना यह है कि भाजपा अपना गढ़ बचा पाती है या विपक्ष यहाँ नई कहानी लिखता है। इतना तय है कि गया टाउन का चुनाव इस बार बिहार की राजनीति में बड़ा असर डालेगा।