भागलपुर विधानसभा सीट Bihar की राजनीति में हमेशा अहम रही है। 2010 में भाजपा, 2015 और 2020 में कांग्रेस ने जीत दर्ज की। अब 2025 का चुनाव तय करेगा कि कांग्रेस लगातार तीसरी बार जीतेगी या भाजपा वापसी करेगी।
भागलपुर। बिहार की राजनीति में भागलपुर विधानसभा सीट को हमेशा से अहम माना जाता है। यह सीट सामान्य श्रेणी की है। यहां शहरी और ग्रामीण, दोनों तरह के मतदाता हैं, जिसकी वजह से चुनावी मुद्दे भी अलग-अलग रहते हैं। शहर के वोटर विकास और रोजगार को अहम मानते हैं, जबकि गांवों में बुनियादी सुविधाएं और जातीय प्रतिनिधित्व बड़े सवाल होते हैं।
तो ऐसे में पहले जानते हैं कि पिछले तीन चुनावों का परिणाम क्या रहा है।
2010 का चुनाव: भाजपा की जीत
साल 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां बड़ी जीत दर्ज की थी। अश्विनी कुमार चौबे को करीब 42 प्रतिशत वोट मिले थे। कांग्रेस उम्मीदवार अजीत शर्मा को लगभग 33 प्रतिशत वोट मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे। इस चुनाव में भाजपा का दबदबा साफ दिखा।

2015 का चुनाव: कांग्रेस की वापसी
2015 में कांग्रेस ने मजबूत वापसी की। इस बार अजीत शर्मा ने भाजपा उम्मीदवार अर्जित शश्वत चौबे को हराया। कांग्रेस को लगभग 46 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा 39 प्रतिशत वोट पर सिमट गई।
2020 का चुनाव: कांटे की टक्कर
2020 का मुकाबला बेहद कड़ा रहा। कांग्रेस से अजीत शर्मा फिर मैदान में उतरे। उन्हें करीब 40.5 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार रोहित पांडेय को 39.8 प्रतिशत वोट हासिल हुए। जीत का अंतर केवल 1,113 वोटों का रहा। इस परिणाम ने साफ कर दिया कि भागलपुर में मुकाबला अब बराबरी का है।
जातीय समीकरण
- भागलपुर की राजनीति पर जातीय संतुलन का गहरा असर है।
- अनुसूचित जातियों की आबादी लगभग 8 प्रतिशत है।
- ओबीसी और ईबीसी की संख्या यहां काफी बड़ी है।
- मुस्लिम वोटर भी बड़ी भूमिका निभाते हैं और कई चुनावों में निर्णायक साबित होते हैं।
कांग्रेस को अक्सर मुस्लिम और पिछड़े वर्गों का समर्थन मिलता रहा है। वहीं भाजपा का आधार मुख्य रूप से सवर्ण और शहरी वोटर रहे हैं। यही वजह है कि दोनों दलों के बीच हर बार सीधा मुकाबला देखने को मिलता है।
क्या है वोटिंग पैटर्न
- पिछले तीन चुनावों पर नजर डालें तो साफ होता है कि यहां का मतदाता एकतरफा नहीं है।
- 2010 में भाजपा ने बड़ी बढ़त से जीत हासिल की।
- 2015 और 2020 में कांग्रेस ने जीत दर्ज की।
- 2020 का चुनाव इस सीट की टक्कर वाली स्थिति को और पुख्ता करता है।
2025 का चुनाव: किसके लिए चुनौती, किसके लिए उम्मीद?
आगामी चुनाव में भागलपुर की लड़ाई बेहद दिलचस्प हो सकती है।
कांग्रेस – अजीत शर्मा लगातार दो बार यहां से विधायक बने हैं। लेकिन पिछली बार जीत का अंतर बहुत कम रहा। कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह केवल जातीय समीकरण पर भरोसा न करे, बल्कि स्थानीय विकास और नए मुद्दों पर भी ध्यान दे।
भाजपा – 2020 में बेहद कम अंतर से हारने के बाद भाजपा इस सीट पर पूरी ताकत लगाने की तैयारी में है। पार्टी के लिए यहां से जीतना प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। सही उम्मीदवार और सही रणनीति के साथ भाजपा वापसी कर सकती है।
अन्य दल – राजद और जदयू सीधे मुकाबले में नहीं दिखते। लेकिन यदि वे अलग से मजबूत उम्मीदवार उतारते हैं या किसी गठबंधन का हिस्सा बनते हैं, तो वोटों का बंटवारा होगा और इसका असर नतीजों पर पड़ेगा।

नए मतदाता भी तय करेंगे नतीजा
2025 के चुनाव में बड़ी संख्या में नए मतदाता पहली बार वोट डालेंगे। महिलाओं और युवाओं का झुकाव किस पार्टी की ओर रहता है, यह भी परिणाम तय करने में अहम होगा। शहरी मतदाताओं के बीच रोजगार और बुनियादी ढांचा बड़े मुद्दे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पानी और जातीय प्रतिनिधित्व अभी भी प्राथमिकता में है।
भागलपुर विधानसभा सीट अब किसी भी दल की “सेफ सीट” नहीं रही। भाजपा ने 2010 में जीत दर्ज की थी, लेकिन 2015 और 2020 में कांग्रेस ने कब्जा जमाया। हालांकि 2020 के बेहद करीबी नतीजे ने यह साफ कर दिया है कि यहां नतीजे आखिरी समय तक तय नहीं होते।
2025 का चुनाव इस सीट के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। क्या कांग्रेस लगातार तीसरी बार जीत का सिलसिला जारी रखेगी, या भाजपा वापसी करेगी? इतना तय है कि भागलपुर का यह मुकाबला बिहार की राजनीति का रुख तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।