2010 में भाजपा, 2015 में कांग्रेस और 2020 में फिर भाजपा ने करीबी जीत हासिल की थी।
जातीय समीकरण, विकास और नए मतदाता तय करेंगे इस बार किसकी बनेगी सरकार।
बेगूसराय विधानसभा में भाजपा-कांग्रेस की सीधी टक्कर, किसके पलड़े भारी?
बेगूसराय। बेगूसराय को कभी “लाल भूमि” भी कहा जाता था क्योंकि यह क्षेत्र लंबे समय तक वामपंथ और किसान आंदोलनों का गढ़ रहा है। समय के साथ यहां राजनीति का समीकरण बदला है, लेकिन आज भी जातीय संतुलन और विकास के मुद्दे चुनाव को प्रभावित करते हैं।
बिहार की राजनीति में बेगूसराय विधानसभा सीट का हमेशा से विशेष महत्व रहा है। यह सीट सामान्य श्रेणी की है और यहां हर जाति के उम्मीदवार चुनाव लड़ सकते हैं।
पिछले तीन चुनावों का परिणाम
2010 का चुनाव : भाजपा की जीत
साल 2010 में भाजपा के सुरेंद्र मेहता ने यहां जीत दर्ज की। उन्होंने लगभग 20 हज़ार वोटों की बढ़त के साथ कांग्रेस और अन्य दलों को पीछे छोड़ दिया। इस जीत ने भाजपा के लिए बेगूसराय को मजबूत सीट साबित किया।
2015 का चुनाव : कांग्रेस की वापसी
2015 में कांग्रेस उम्मीदवार अमिता भूषण ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी और बड़ी जीत दर्ज की। उन्होंने लगभग 16 हज़ार वोटों के अंतर से भाजपा को हराया। यह नतीजा बताता है कि बेगूसराय में मतदाता एकतरफा नहीं बल्कि बदलाव पसंद करते हैं।
2020 का चुनाव : भाजपा की करीबी जीत
2020 में मुकाबला बेहद कड़ा रहा। इस बार भाजपा के कुंदन कुमार ने कांग्रेस की अमिता भूषण को हराया। जीत का अंतर मात्र 4,500 वोटों का रहा। यह साफ संकेत था कि यहां का मतदाता हर बार नई परिस्थिति में अलग निर्णय लेता है।
जातीय समीकरण
बेगूसराय की राजनीति पर जातीय संतुलन का गहरा असर है।
यहां भूमिहार समुदाय का दबदबा माना जाता है और कई बार यही समाज चुनावी परिणाम तय करता है।
मुस्लिम और यादव वोटरों की संख्या भी बड़ी है। अगर ये दोनों वर्ग किसी पार्टी के साथ मजबूती से जुड़ जाएं, तो नतीजे बदल सकते हैं।
अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और अनुसूचित जाति (SC) भी अहम भूमिका निभाते हैं।
यानी किसी भी दल को सिर्फ एक जाति पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि सबको साथ लेकर चलना पड़ता है।
क्या है वोटिंग पैटर्न
बेगूसराय विधानसभा के पिछले चुनावों पर नजर डालें तो एक खास पैटर्न सामने आता है।
- 2010 में भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की।
- 2015 में कांग्रेस ने वापसी की और आराम से जीत हासिल की।
- 2020 में भाजपा को जीत मिली, लेकिन बहुत कम अंतर से।
इससे साफ होता है कि यहां मतदाता बार-बार दल और उम्मीदवार बदलते हैं। छोटे दल जैसे LJP या RLSP भी वोट काटने का काम करते हैं और बड़े दलों का समीकरण बिगाड़ देते हैं।

2025 का चुनाव : किसके लिए चुनौती, किसके लिए उम्मीद?
भाजपा – 2020 की करीबी जीत के बाद भाजपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल है। भूमिहार समाज का समर्थन बनाए रखना और बाकी समुदायों में पैठ बनाना भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
कांग्रेस/महागठबंधन – कांग्रेस के लिए मुस्लिम और यादव वोटरों को एकजुट रखना अहम है। अमिता भूषण पहले भी यहां से जीत चुकी हैं, लेकिन उन्हें भूमिहार समाज और शहरी मतदाताओं में भी भरोसा जीतना होगा।
अन्य दल – छोटे दलों की मौजूदगी से मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। यदि वे मजबूत उम्मीदवार उतारते हैं, तो वोटों के बंटवारे से मुख्य दलों को नुकसान होगा।
नए मुद्दे और मतदाता
बेगूसराय कभी औद्योगिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता था, लेकिन अब अधिकांश कारखाने बंद हो चुके हैं। स्थानीय लोग चाहते हैं कि उद्योग फिर से शुरू हों और रोजगार के अवसर मिलें। इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा भी बड़े मुद्दे हैं।
2025 में नए मतदाता, खासकर युवा और महिलाएं, किस ओर झुकते हैं यह नतीजों को तय करेगा।
बेगूसराय विधानसभा अब किसी दल की “सेफ सीट” नहीं है। 2010 में भाजपा ने जीत दर्ज की, 2015 में कांग्रेस ने वापसी की और 2020 में फिर भाजपा ने करीबी जीत हासिल की। यहां की राजनीति जातीय संतुलन, विकास और उम्मीदवार की छवि पर टिकी है।
2025 का चुनाव एक बार फिर कांटे का होगा। क्या भाजपा अपना किला बचा पाएगी या कांग्रेस फिर वापसी करेगी? इतना तय है कि बेगूसराय का यह मुकाबला बिहार की राजनीति में अहम असर छोड़ेगा। Instant update