कौन है सुशीला कार्की जो संभाल सकती हैं नेपाल की कमान! अंतरिम प्रधानमंत्री के लिए सबसे प्रमुख दावेदार
नेपाल में हिंसक प्रदर्शनों के बाद अंतरिम प्रधानमंत्री की चर्चा तेज़ है। पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की सबसे प्रमुख दावेदार मानी जा रही हैं। जानें उनकी पृष्ठभूमि, करियर और राजनीतिक सफर।

बीते दिनों नेपाल में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद सत्ता की बागडोर फिलहाल सेना के हाथों में है। अब नेपाल की कमान कौन संभालेगा, इसको लेकर चर्चा का बाज़ार गरम है। इस बीच Gen Z आंदोलनकारियों ने एक वर्चुअल बैठक बुलाई, जिसमें 5,000 से अधिक युवाओं ने हिस्सा लिया। बैठक में सबसे ज़्यादा समर्थन नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को मिला।
अब तक जिन नेताओं को Gen Z अपना पोस्टर लीडर मान रहा था, उन्होंने युवाओं की अपील का जवाब नहीं दिया। इस चुप्पी के बाद आंदोलनकारियों का रुख बदल गया और सुशीला कार्की के पक्ष में समर्थन बढ़ने लगा। कार्की ने प्रधानमंत्री पद के लिए कम से कम 1,000 लिखित हस्ताक्षरों की अपील की थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तक उन्हें 2,500 से अधिक लिखित हस्ताक्षर मिल चुके हैं। इसके बाद अनुमान जताया जा रहा है कि सुशीला कार्की को देश का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है।
कौन हैं सुशीला कार्की?

7 जून 1952 को बिराटनगर में जन्मीं सुशीला सात भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं। कानून की छात्रा रहीं कार्की ने अपनी वकालत की शुरुआत बिराटनगर से ही की। जनवरी 2009 में उन्हें नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में एड-हॉक जज नियुक्त किया गया और 2010 में स्थायी जज बना दिया गया। 2016 में वे नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस बनीं और 7 जून 2017 तक सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस के पद पर रहीं।
सत्ता से टकराने वाली शख्सियत
कार्की ने अपने कार्यकाल में कई बड़े फैसले लिए थे, जिनकी वजह से 2017 में उन पर माओवादी और नेपाली कांग्रेस ने महाभियोग प्रस्ताव लाया था। इसका पूरे देश में विरोध हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने संसद की कार्यवाही रोकने और प्रस्ताव वापस लेने का आदेश दिया। इतने दबाव के बाद भी कार्की मजबूती से खड़ी रहीं, जिसकी वजह से जनता के बीच उनकी एक मजबूत जज के रूप में पहचान बनी रही।
कार्की के पति कांग्रेस के बड़े नेता
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात दुर्गा प्रसाद सुवेदी से हुई। उस वक्त तक सुवेदी नेपाली कांग्रेस के चर्चित युवा नेता और पंचायती शासन के खिलाफ चल रहे आंदोलन में काफी सक्रिय थे।
सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद कार्की ने कई किताबें भी लिखीं। 2018 में उनकी आत्मकथा ‘न्याय’ और 2019 में उनका उपन्यास ‘कारा’ प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने बिराटनगर जेल के अनुभव साझा किए।