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बाढ़ की चपेट में उत्तर भारत, हर तरफ तबाही का मंज़र !

दो हफ्तों से लगातार हो रही बारिश के कारण पूरा उत्तर भारत बाढ़ की चपेट में आ गया है। मैदानी इलाकों में बाढ़ व पहाड़ों पर भूस्खलन की समस्या लोगों की मुसीबत और बढ़ा रही है।

मौसम विभाग के अनुसार सितंबर के अंत तक अगर सामान्य बारिश भी हुई तो यह मानसून 1988 की बारिश का रिकॉर्ड तोड़ सकता है।

पिछले दो हफ्तों में तिगुनी हुई बारिश

उत्तर भारत बाढ़ का मुख्य कारण अत्यधिक वर्षा है। 22 अगस्त से 4 सितंबर के बीच सामान्य से तीन गुना अधिक (205.3मिमी) बारिश दर्ज की गई।

जबकि इस अवधि में बारिश सिर्फ 73.1 मिमी होती है, ये पिछले 14 वर्ष में सबसे ज्यादा है।

मानसून का एक तिहाई हिस्सा सिर्फ 14 दिन में

पिछले 14 दिन की बारिश ने मानसून सीजन का 35% कोटा पूरा कर दिया है।

  • अब तक कुल वर्षा: 691.7 मिमी
  • सामान्य से 35% अधिक बारिश
  • सितंबर में सर्वाधिक वर्षा की संभावना
  • पिछले पांच दशकों में सबसे ज्यादा बरसात वाला मानसून बन सकता है

भारी बारिश का कारण

IMD के अनुसार दो मौसम प्रणालियों का अनूठा मेल देखने को मिला:

भूमध्य सागर से आने वाली नमी (पश्चिमी विक्षोभ)

पूर्व से चल रही मॉनसूनी हवाओं की वजह से भारी बारिश

23 व 27 अगस्त और फिर 29 अगस्त से 4 सितंबर तक इसी वजह से बारिश ने रिकॉर्ड तोड़ दिया और पहाड़ी राज्यों में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएँ हुईं।

राज्यवार प्रभाव – किन राज्यों पर सबसे ज्यादा असर

पंजाब

दशकों बाद सबसे बड़ी बाढ़, पहले हफ्ते में 388% और दूसरे हफ्ते में 454% ज्यादा वर्षा।

दिल्ली-हरियाणा-चंडीगढ़

सामान्य से 325% अधिक बारिश, यमुना नदी खतरे के तीसरे सबसे ऊँचे स्तर पर।

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड

भूस्खलन और बाढ़, बारिश क्रमशः 314% और 190% ज्यादा।

जम्मू-कश्मीर

वैष्णो देवी मार्ग पर बादल फटना, पूरे क्षेत्र में 240% अतिरिक्त वर्षा।

राजस्थान (पश्चिमी हिस्सा)

285% अधिक बारिश।

तबाही और चेतावनी

उत्तर भारत बाढ़ ने पूरे हालात बिगाड़ दिए हैं। वहां के गाँव जलमग्न हैं, शहरों में जलभराव है और कई राज्यों में जान-माल का नुकसान हुआ है।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से भविष्य में ऐसी मौसमी घटनाओं के विकराल रूप देखने को मिल सकते हैं।

 

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