परिवार ने बताया मददगार, पुलिस ने माना आरोपी; मौत के बाद बिहार में सियासत गरमाई
आरा/भोजपुर। बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत अब बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद का रूप ले चुकी है। पुलिस भी प्रशासन के साथ बैकफूट पर आ गई है। वहीं मृतक के परिजन इसे सुनियोजित हत्या करार दे रहे हैं। घटना के बाद पूरे इलाके में आक्रोश फैल गया है, जबकि विपक्ष से लेकर सत्ता पक्ष के कई नेताओं ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठा रहे है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुँच चुका है ।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है। इस कथित एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है।
याचिका में मांग की गई है कि मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए। साथ ही, पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की भी मांग उठाई गई है।
छह पुलिसकर्मी निलंबित
मामले पर बढ़ते दबाव के बीच पुलिस प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए शाहपुर थानेदार, एक सब-इंस्पेक्टर, एक सहायक सब-इंस्पेक्टर सहित कुल छह पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है।
हालांकि, मृतक के परिजन और समर्थक इस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि केवल निलंबन पर्याप्त नहीं है और पूरे मामले की स्वतंत्र तथा निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।
17 जून को पुलिस कार्रवाई के दौरान लगी गोली
17 जून 2026 को बिहार पुलिस ने भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में भरत तिवारी के खिलाफ कार्रवाई की थी । पुलिस का दावा है कि उसे सूचना मिली थी कि भरत तिवारी के पास अवैध हथियार है और वह किसी अप्रिय घटना को अंजाम दे सकता है। इसी सूचना के आधार पर पुलिस टीम उसे पकड़ने के लिए गांव पहुंची।
पुलिस के अनुसार, कार्रवाई के दौरान भरत तिवारी ने पुलिस टीम पर हमला करने की कोशिश की, जिसके बाद हालात बिगड़ गए और गोलीबारी हुई। इस दौरान भरत तिवारी गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल इलाज के लिए सदर अस्पताल आरा ले जाया गया, जहां से उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीएमसीएच) रेफर कर दिया। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
हालांकि, परिजनों का कहना है कि भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था और इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें गोली मारी। परिवार का आरोप है कि यह मुठभेड़ नहीं बल्कि योजनाबद्ध हत्या थी।
मौत के बाद चर्चा में आए भरत तिवारी
स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले कुछ समय से वह सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय थे। ग्रामीणों का कहना है कि वह जरूरतमंद लोगों की मदद करते थे और गांव तथा आसपास के क्षेत्रों की समस्याओं को सोशल मीडिया के माध्यम से उठाते थे। बाढ़ पीड़ितों, गरीबों और वंचित वर्गों के मुद्दों को लेकर वह लगातार आवाज उठाते रहे थे। स्थानीय स्तर पर उन्हें एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी देखा जाता था।
फेसबुक पोस्ट से शुरू हुआ विवाद
भरत तिवारी का नाम पहली बार विवादों में 15 जून 2026 को सामने आया। पुलिस के अनुसार, उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट साझा की थी जिसमें कथित तौर पर देश में क्रांतिकारी युद्ध शुरू करने और जगदीशपुर के एसडीएम को जान से मारने जैसी बातें लिखी गई थीं।
पोस्ट सामने आने के बाद पुलिस उनकी तलाश में उनके घर पहुंची, लेकिन वह वहां नहीं मिले। पुलिस का कहना है कि 16 जून को शाहपुर थाना को सूचना मिली कि एक व्यक्ति हथियार लेकर घूम रहा है, जिसकी पहचान भरत तिवारी के रूप में हुई।
इसी बीच भरत तिवारी फेसबुक पर लाइव आए और उन्होंने प्रशासन तथा बिहार सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। लाइव वीडियो में उन्होंने दावा किया कि प्रशासन उन्हें झूठे मामलों में फंसा रहा है और उनका एनकाउंटर करने की तैयारी की जा रही है।
16 जून की देर रात भोजपुर पुलिस ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर कहा कि भरत तिवारी मानसिक रूप से परेशान प्रतीत हो रहे हैं और उन्हें चिकित्सकीय सहायता दिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। पुलिस ने यह भी कहा कि हथियार बरामदगी और किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
इसके अगले दिन यानी 17 जून की सुबह भरत तिवारी एक बार फिर फेसबुक लाइव आए। इस दौरान उन्होंने पुलिस के दावों को खारिज किया और खुद को मानसिक रूप से अस्थिर बताए जाने का विरोध किया। उन्होंने अपनी तुलना स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से की और प्रशासन पर निशाना साधा।
परिवार ने पुलिस की कहानी पर उठाए सवाल
भरत तिवारी की मौत के बाद उनके परिजनों ने पुलिस के पूरे घटनाक्रम पर सवाल खड़े कर दिए। परिवार का आरोप है कि घटना से पहले पुलिस ने जबरन घर में प्रवेश किया और परिवार के सदस्यों को धमकाया।
परिजनों का कहना है कि भरत तिवारी लगातार बाढ़ प्रभावित लोगों के पुनर्वास और स्थानीय समस्याओं को लेकर प्रशासन के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। उनका दावा है कि इसी वजह से उन्हें निशाना बनाया गया।
परिवार का आरोप है कि जिस समय पुलिस ने उन्हें घेरा, उस समय उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बावजूद पुलिस ने उन पर गोली चलाई। परिजनों ने मामले की न्यायिक जांच और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।
गांव में भड़का आक्रोश, सड़क जाम
भरत तिवारी का शव गांव पहुंचते ही इलाके में तनाव फैल गया। बड़ी संख्या में ग्रामीण और समर्थक सड़क पर उतर आए और पुलिस कार्रवाई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
प्रदर्शनकारियों ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए बक्सर जाने वाली सड़क को जाम कर दिया। इसके चलते कई घंटों तक यातायात प्रभावित रहा।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने की कोशिश की, लेकिन लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। बाद में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनावपूर्ण स्थिति बनी रही। आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे।
सियासी मुद्दा बना मामला

भरत तिवारी की मौत अब बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। विपक्ष के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने इस मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए राज्य सरकार पर सवाल उठाए हैं।
तेजस्वी यादव ने कहा कि सरकार एक ओर न्यायिक जांच की बात कर रही है, जबकि दूसरी ओर मृतक के परिवार के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने सरकार से पूरे मामले पर स्पष्ट जवाब देने की मांग की।
उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में इससे पहले भी कई एनकाउंटरों को लेकर सवाल उठते रहे हैं और इस मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने सरकार पर जातीय आधार पर कार्रवाई करने का भी आरोप लगाया।
पप्पू यादव ने परिवार से मुलाकात की
पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने भी भरत तिवारी के परिवार से मिलने पहुंचे। उन्होंने परिवार को आर्थिक सहायता दी और कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे।
पप्पू यादव ने कहा कि भरत तिवारी के परिवार को न्याय मिलना चाहिए और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
बीजेपी नेता अश्विनी चौबे ने भी मांगी निष्पक्ष जांच
मामले पर सवाल सिर्फ विपक्ष की ओर से ही नहीं उठाए गए। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने भी इस घटना को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
अश्विनी चौबे ने कहा कि भरत तिवारी सामाजिक सरोकारों से जुड़े युवा थे और गरीब तथा वंचित लोगों की समस्याएं उठाते थे। उन्होंने कहा कि यदि किसी स्तर पर साजिश या गलत कार्रवाई हुई है तो दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाना चाहिए।