इस बार माघ में क्या है खास, संगम तट पर बन रहा है विशेष योग
मकर संक्रांति के साथ सूर्य के उत्तरायण होने से संगम तट पर बढ़ा कल्पवास का पुण्य

प्रयागराज के संगम तट पर माघ महीने की शुरुआत के साथ ही एक अलग ही दुनिया बस जाती है। ठंड के बीच तंबुओं की कतारें, साधु-संतों की गूंजती वाणी, गंगा में डुबकी लगाते श्रद्धालु और हर ओर भक्ति का माहौल यही है माघ मेला और कल्पवास। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी प्राचीन काल में मानी जाती थी। माघ महीने में संगम तट पर कल्पवास को हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। इस दौरान गृहस्थ जीवन में रहने वाले लोग भी अपने दैनिक सुख-सुविधाओं से दूर होकर एक महीने तक सादा और संयमित जीवन जीते हैं। न किसी प्रकार की अपेक्षा, न सुविधा की चाह बस नियम, अनुशासन और भक्ति। कल्पवासी दिन में तीन बार गंगा स्नान करते हैं, एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और शेष समय भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ, धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन और प्रवचन सुनने में बिताते हैं।
तंबुओं की नगरी – प्रयागराज
संगम तट पर तंबुओं की नगरी बसाने का काम लगभग अंतिम चरण में है। ज़मीन को समतल और बराबर करने से लेकर बिजली के पोल गाड़ने तक का कार्य पूरा हो चुका है। पानी की पाइपलाइन बिछा दी गई है, पांटून पुल तैयार हो चुके हैं और श्रद्धालुओं की आवाजाही के लिए चेकर्ड प्लेटें भी लगाई जा चुकी हैं। पहली बार मेला क्षेत्र को सात सेक्टरों में बांटा गया है। हर सेक्टर में संतों और कल्पवासियों के लिए अलग-अलग शिविर लगाए जा रहे हैं। शंकराचार्य नगर, आचार्य नगर, दंडी स्वामी नगर और खाक चौक जैसे प्रमुख स्थानों पर महात्माओं और साधुओं के शिविर सज चुके हैं। संतों के प्रवचन के लिए पंडाल तैयार किए जा रहे हैं, जहां दिनभर धर्म, दर्शन और जीवन मूल्यों पर चर्चा होगी। इसके साथ ही रामलीला और रासलीला के आयोजन भी होंगे, जिससे पूरे मेला क्षेत्र में भक्ति की बयार बहेगी।
अनादिकाल से चली आ रही परंपरा
प्रयाग धर्म संघ के अध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल बताते हैं कि कल्पवास कोई नई परंपरा नहीं है। यह अनादिकाल से चली आ रही साधना है, जो समय के साथ और अधिक व्यवस्थित जरूर हुई है, लेकिन उसका मूल स्वरूप आज भी वही है। उनका कहना है कि आज के लोकतांत्रिक युग में भले ही राजसुख के इच्छुक कल्पवासी कम दिखाई देते हों, फिर भी सत्ता में बैठे लोग पुण्य लाभ की भावना से कल्पवासियों की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ते। समय के साथ माघ मेले में बहुत कुछ बदला है। व्यवस्थाएं बेहतर हुई हैं, सुविधाएं बढ़ी हैं। लेकिन जो नहीं बदला है, वह है कल्पवासियों का संकल्प। आज भी वे उसी नियम और तप के साथ कल्पवास करते हैं, जैसे वर्षों पहले किया जाता था। यही कारण है कि कुछ साधक पौष पूर्णिमा से कल्पवास आरंभ करते हैं, तो कुछ मकर संक्रांति से एक महीने का व्रत लेकर प्रयाग पहुंचते हैं।
मकर संक्रांति और कल्पवास का विशेष संयोग
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ महीने में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसे सूर्य के उत्तरायण होने की शुरुआत माना जाता है। कहा जाता है कि इस समय सूर्य अभिजित नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, जो भगवान नारायण को अत्यंत प्रिय है। इसी काल में भूमंडल और भानुमंडल का सीधा संबंध तीर्थराज प्रयाग में बनता है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि पूरे संसार में केवल प्रयागराज ही ऐसा स्थान है, जहां माघ महीने में कल्पवास करने का विधान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्मा जी ने प्रयाग में अश्वमेध यज्ञ किया था। मान्यता है कि माघ मास में सभी देवी-देवता और ऋषि-मुनि अदृश्य रूप में संगम तट पर वास करते हैं। पद्म पुराण और मत्स्य पुराण में उल्लेख मिलता है कि माघ में संगम स्नान और कल्पवास करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
क्या है कल्पवास का असली अर्थ
‘कल्प’ का अर्थ होता है एक लंबी अवधि या आत्मिक परिवर्तन और ‘वास’ का अर्थ है निवास। यानी कल्पवास केवल संगम तट पर रहना नहीं है, बल्कि यह स्वयं के जीवन में बदलाव लाने की साधना है। शास्त्रों के अनुसार, माघ महीने में कल्पवास करने से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से शुद्ध होता है। कल्पवासी एक महीने तक सांसारिक मोह-माया से दूर रहते हैं। दिन में केवल एक बार भोजन, वह भी पूरी तरह सात्विक। यह नियम शरीर ही नहीं, मन को भी अनुशासित करने का माध्यम माना जाता है। इस दौरान कल्पवासी भगवान विष्णु, सूर्य देव और भगवान शिव की विशेष आराधना करते हैं। मान्यता है कि माघ मास में भगवान विष्णु जल में निवास करते हैं, इसलिए सूर्योदय से पूर्व गंगा स्नान उन्हें अत्यंत प्रिय है।
कहा जाता हैं कि प्रयागराज का संगम केवल तीन नदियों का मिलन नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और साधना का केंद्र है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती तीनों को साक्षात देवी माना गया है। इन्हीं के मिलन स्थल पर स्नान कर कल्पवासी अपनी साधना की शुरुआत करते हैं। यही स्नान कल्पवास का आधार और उसकी आत्मा माना जाता है।