पाकिस्तान की आर्थिक सेहत चरमराई, 5 महीनों में कर्ज बढ़ा, IMF भी नहीं दे सका राहत

पड़ोसी देश पाकिस्तान भले ही दो साल पहले आए गंभीर आर्थिक संकट से किसी तरह उबर गया हो, लेकिन आज भी अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर हालात में खड़ी है। हालात इतने नाजुक हैं कि अगर समय-समय पर विदेशी कर्ज और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मदद न मिले, तो देश में दोबारा भुखमरी जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। यह बात किसी बाहरी एजेंसी ने नहीं, बल्कि खुद पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ ने अपनी रिपोर्ट में कही है।
कर्ज के सहारे चल रही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था
पाकिस्तान की सरकार आज अपनी रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर जनता की बुनियादी सुविधाओं तक के लिए विदेशी कर्ज पर निर्भर होती जा रही है। देश की आय इतनी नहीं है कि वह अपने खर्च पूरे कर सके। इसी वजह से उसे बार-बार अंतरराष्ट्रीय बाजार और संस्थाओं का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। चाहे आईएमएफ हो, विश्व बैंक या फिर दूसरे देश पाकिस्तान की आर्थिक गाड़ी फिलहाल उधार के ईंधन पर ही चल रही है।
पांच महीनों में कर्ज में तेज बढ़ोतरी
डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले पांच महीनों यानी जुलाई से नवंबर के बीच पाकिस्तान द्वारा लिए गए विदेशी कर्ज और अनुदान में करीब 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस दौरान कुल विदेशी फंड बढ़कर 3.032 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 2.667 अरब डॉलर था। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जहां एक तरफ विदेशी कर्ज तेजी से बढ़ा है, वहीं दूसरी तरफ अनुदान यानी ग्रांट्स में भारी गिरावट देखने को मिली है। विदेशी कर्ज में 46.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 2.521 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि ग्रांट्स में 43 प्रतिशत की गिरावट आई और यह घटकर सिर्फ 54 मिलियन डॉलर रह गया। इसका मतलब साफ है, पाकिस्तान को अब बिना शर्त मदद कम मिल रही है और उसे ज्यादा पैसा ब्याज के साथ लौटाने वाले कर्ज के रूप में मिल रहा है।
एक महीने में आधा अरब डॉलर से ज्यादा कर्ज
अगर सिर्फ नवंबर महीने की बात करें, तो पाकिस्तान ने अकेले इस महीने में 511 मिलियन डॉलर का विदेशी कर्ज लिया। यह अक्टूबर में लिए गए 471 मिलियन डॉलर से ज्यादा है। हालांकि नवंबर 2024 की तुलना में यह रकम करीब 46 प्रतिशत कम रही, लेकिन इसके बावजूद स्थिति को राहत भरी नहीं कहा जा सकता। खास बात यह है कि नवंबर की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने पाकिस्तान को 1.2 बिलियन डॉलर की अतिरिक्त सहायता को मंजूरी दी थी, लेकिन इस राशि को अभी मौजूदा कर्ज के आंकड़ों में शामिल नहीं किया गया है। यानी आने वाले समय में कुल कर्ज का बोझ और बढ़ने वाला है।
आईएमएफ से राहत, लेकिन शर्तों का बोझ
पाकिस्तान सरकार ने इस वित्त वर्ष में कुल 19.9 अरब डॉलर के विदेशी फंड जुटाने का लक्ष्य रखा है, जो पिछले साल के 19.4 अरब डॉलर के लक्ष्य से थोड़ा कम है। आईएमएफ से मिली नई 1.2 बिलियन डॉलर की किश्त के बाद पाकिस्तान को इस संस्था से मिलने वाली कुल सहायता बढ़कर 3.3 बिलियन डॉलर हो जाएगी। लेकिन यह मदद बिना शर्त नहीं है। आईएमएफ ने इस बार पाकिस्तान पर पहले से ज्यादा सख्ती दिखाई है। नई सहायता के बदले पाकिस्तान को 11 नई शर्तें माननी होंगी। इसके साथ ही 18 महीनों की अवधि में लागू शर्तों की कुल संख्या 64 से ज्यादा हो चुकी है।
इन शर्तों में भ्रष्टाचार पर रोक, टैक्स सिस्टम में सुधार, बिजली और ऊर्जा सेक्टर में बदलाव, सरकारी खर्च में कटौती, प्रशासनिक सुधार और बेहतर शासन व्यवस्था जैसे मुद्दे शामिल हैं। साफ है कि आईएमएफ का मानना है कि सिर्फ कर्ज देकर पाकिस्तान की हालत नहीं सुधरेगी, जब तक वह अपनी अंदरूनी कमजोरियों पर काम नहीं करता।
विदेशी कर्ज पर बढ़ती निर्भरता
आईएमएफ की ताजा मदद ऐसे वक्त आई है, जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से विदेशी कर्ज पर टिकी हुई नजर आ रही है। साल 2023 में भले ही पाकिस्तान तकनीकी रूप से दिवालिया होने से बच गया हो, लेकिन उसके बाद हालात में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ। देश आज भी कई गंभीर आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है। चालू खाता घाटा बढ़ता जा रहा है, विदेशी मुद्रा भंडार कमजोर बना हुआ है, महंगाई आम लोगों की कमर तोड़ रही है और पाकिस्तानी रुपये की कीमत लगातार गिरती जा रही है। इन्हीं कारणों से पाकिस्तान आज अर्जेंटीना और यूक्रेन के बाद दुनिया के सबसे ज्यादा कर्जदार देशों में गिना जाने लगा है।