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लोन हुआ सस्ता, FD पर भी मिल रहा ज्यादा ब्याज ! जानिए कहाँ मिल रही है 8% की ब्याज दर

FD में पैसा लगाना  क्या दे सकता है म्यूचूअल फंड और शेयर बाजार को टक्कर  ? रेपो रेट गिरने के बाद यहाँ  मिल रहा है बढ़िया  रिटर्न

हाल ही में आरबीआई  की मॉनीटरी पॉलिसी कमिटी की बैठक में बड़ा फैसला लिया गया है। जैसे  अनुमान  जताया जा रहा था  आरबीआई ने रेपो रेट की दरों में 0.25 फीसदी की कटौती की । अब रेपो रेट की दर 5.25% हो गई है ।   इसके बाद से कयास लग रहे थे कि एफडी रेट में कटौती शुरू हो जाएगी ।  आमतौर पर माना जाता है कि रेपो रेट में कटौती के बाद से  ही लोन की  दरों और जमा दरों में कटौती होती है। भारत में अब भी एक बड़ा वर्ग म्यूचूअल फंड और शेयर बाजार में निवेश से दूर है इसलिए इनके माथे पर शिकन पड़ना लाजिमी है।

 

एफडी  दरें घटने की  संभावना कम

 

तमाम बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ अनुमान जता रहे  है कि  रेपो रेट में कटौती   के बाद भी बैंकों की एफडी की दरें घटने की  संभावना कम है। इसकी वजह बताई जा रही है घटते डिपॉजिट और निवेश के दूसरे विकल्पों से मिल रही प्रतिस्पर्धा ।  बैंकों का मार्जिन दबाव में है इसलिए लोन और एफडी दोनों पर दरें   सावधानी से घटाई जाएंगी। हालांकि  एफडी में बड़े  बैंकों की एफडी दर अब घटकर  7.1% से 6.5% तक आ गई है। कई जगह सीनियर सिटीजंस के  लिए छोटे स्माल फाइनेंस  बैंक में अभी भी   7% की एफडी दर मिल रही है। ज्यादातर बैंक कम अवधि वाली एफडी पर कटौती करेंगे।

 

कई स्मॉल फाइनेंस बैंक अभी सामान्य नागरिकों को 7.5% और वरिष्ठ नागरिकों को 8% तक ब्याज ऑफर कर रहे हैं वहीं पब्लिक सेक्टर के बैंक 6.5% के आसपास ब्याज की दरें रखे हुए हैं। डीआईसीजीसी   के अंतर्गत आने वाले सभी बैंकों में एक अकाउंट पर 5 लाख तक की जमा राशि पूरी तरह सुरक्षित होती है

 

लंबे समय तक स्थिर रहे जमा दर

 

कोविड के बाद से ही आरबीआई ने लंबे समय तक रेपो रेट की दर स्थिर रखी थी। इसलिए एफडी की दरे भी उच्च बनी हुई थी ।  लेकिन फरवरी से लेकर अब तक आरबीआई रेपो रेट में 1% कम कर चुका था । हालांकि आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा की पिछली दो बैठकों में इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया था और यह 5.5 % पर स्थिर रखी हुई थी । अब ये दर घटकर 5.25% हो गई है

 

क्या होता है रेपो रेट

 

देश की राजकोषीय नीति निर्माण के लिए सरकार राजकोषीय  पॉलिसी बनती है वैसे ही आरबीआई के पास मॉनिटरी पॉलिसी बनाने के लिए अलग-अलग टूल होते हैं।  जिनमें से एक रेपो रेट है । ये  वह दर है जिस पर केंद्रीय बैंक  व्यापारिक और अन्य बैंकों को ऋण प्रदान करती है।  अगर आरबीआई रेपो रेट में वृद्धि करती है तो व्यापारिक और तमाम बैंकों को ऋण महंगा मिलता है।  इसी प्रकार अपना मार्जिन रख ग्राहकों को बैंक भी ऊंची दरों पर ऋण प्रदान करते हैं ।

 

जब आरबीआई को महंगाई को नियंत्रित करना हो उसे समय आरबीआई रेपो रेट में वृद्धि करती है ऊंची दरों की वजह से आम जनता अपेक्षाकृत कम ब्याज  लेती है।  बाजार में मुद्रा की सप्लाई कम होने से महंगाई नियंत्रित होती है।  जब आरबीआई को बाजार को अतिरिक्त पैसा देना होता है जिससे कि व्यापार बढ़े और आम जनता अधिक खरीदी करें उसे समय आरबीआई रेपो रेट की दरों को कम करती है।  जिससे तमाम कमर्शियल बैंक्स कम दरों पर ऋण हासिल करें और यही फायदा जनता तक भी पहुंचे।

 

आम जनता के लिए क्यों है अहम

आम जनता के लिए रेपो रेट काफी अहम इसीलिए भी है क्योंकि इसका असर होम लोन की ब्याज दरों से लेकर  पर्सनल लोन और ईएमआई तक पर भी पड़ता है । अगर आरबीआई दरों में कटौती करता है तो लाखों करोड़ों परिवारों को इनमें राहत मिलती है।  इनमें वृद्धि करने पर ईएमआई  से लेकर कार लोन तक में बढ़ोतरी हो सकती है।

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