होमाई व्यारावाला भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट थीं, जिन्होंने गांधी, नेहरू से लेकर आज़ादी के ऐतिहासिक क्षणों को कैमरे में कैद कर इतिहास रचा।
भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट, जिसने इतिहास को सिर्फ देखा नहीं उसे कैमरे में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।
यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि उस दौर की है जब समाज कहता था। “ये काम सिर्फ पुरुष कर सकते हैं।” पर इतिहास इस बात का गवाह है कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो नियमों को नहीं मानते, बल्कि नए नियम लिखते हैं। ऐसी ही एक शख्सियत थीं होमाई व्यारावाला, जिन्हें भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट कहा जाता है। आज हम जब आज़ादी के दौर की पुरानी तस्वीरें देखते हैं । गांधी जी चलते हुए, नेहरू जी हाथ हिलाते हुए, पहला तिरंगा फहरते हुए, दलाई लामा भारत में कदम रखते हुए । वो सिर्फ तस्वीरें नहीं हैं, वो एक दौर की साँसें हैं। और इनमें से कई तस्वीरों के पीछे होमाई व्यारावाला का कैमरा और उनकी मेहनत है।
बचपन और सपनों की शुरुआत
9 दिसंबर 1913 को गुजरात के नवसारी में जन्मी होमाई एक साधारण पारसी परिवार में पली-बढ़ीं। उनके पिता थिएटर में काम करते थे, इसलिए उनका बचपन मंच, कला और घूमते-फिरते जीवन के बीच बीता। जगह-जगह जाना, नए लोगों से मिलना, अलग माहौल में रहना। यह सब उनके अंदर एक खास समझ और संवेदनशीलता लेकर आया, जो बाद में उनकी फोटोग्राफी में साफ नज़र आई। उस समय लड़कियों की पढ़ाई भी सीमित थी, पर होमाई अलग थीं। परिवार मुंबई आया और वहीं उन्होंने आगे की पढ़ाई की। मुंबई ने उन्हें मौका दिया। सोचने का, सीखने का, और खुद को पहचानने का। जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में पढ़ाई के दौरान उन्हें कैमरा मिला और उसी पल शायद उनकी ज़िंदगी का रास्ता तय हो गया। कैमरा उनके लिए सिर्फ मशीन नहीं था, बल्कि दुनिया देखने का नया तरीका था।

फोटोग्राफी का सफर और ‘डालडा 13’ की पहचान
कॉलेज में उनकी मुलाकात मानेकशॉ व्यारावाला से हुई, जो पहले से ही फोटोग्राफी के क्षेत्र में थे। वही उनके प्रेरक, साथी और बाद में पति बने। उन्होंने होमाई को कैमरा चलाना सिखाया। उनकी पहली कमाई कॉलेज के सहपाठियों की पिकनिक तस्वीरें खींचकर हुई। उस दौर में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक लड़की कैमरा उठाकर मैदानों, राजनीतिक सभाओं या ऐतिहासिक कार्यक्रमों में फोटो खींचेगी।
शुरुआत में उनकी तस्वीरें उनके पति के नाम से छपती थीं, क्योंकि महिला नाम देखकर उस समय अख़बारों के संपादक छापने से हिचकते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनका काम इतना दमदार हुआ कि वो खुद एक पहचान बन गईं और वो पहचान थी “Dalda 13” कहा जाता है कि उन्हें संख्या 13 से खास लगाव था। उनका जन्म साल 1913 में हुआ था, उनका पहला कैमरा रोल नंबर 13 वाला था और उनकी कार का नंबर भी 13 था। धीरे-धीरे यह नाम एक ब्रांड की तरह पहचाना जाने लगा।

दिल्ली की सड़कों से दुनिया के मंच तक
सन 1942 में वे दिल्ली आ गईं और ब्रिटिश इन्फॉर्मेशन सर्विस में काम शुरू किया। यह वही दौर था जब भारत स्वतंत्रता आंदोलन की आग में तप रहा था। नेता गिरफ्तार हो रहे थे, जनसभाएं हो रही थीं, आंदोलन अपने चरम पर था। और ठीक वहीं, भीड़ में, पुरुष फोटोग्राफरों के बीच, साड़ी पहने, कंधे पर कैमरा लिए, बेहद शांत चेहरे के साथ होमाई अपना काम कर रही थीं। वे किसी सेलिब्रिटी की तरह नहीं, बल्कि एक पर्यवेक्षक की तरह काम करती थीं। शांत, केन्द्रित, बिना किसी दिखावे के।
आजादी के ऐतिहासिक लम्हों की साक्षी
15 अगस्त 1947 भारत की आज़ादी का वह जश्न, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। पर तस्वीरें बोलती हैं। और उन तस्वीरों में सबसे भावनात्मक तस्वीरें वही थीं, जो होमाई ने खींचीं। जवाहरलाल नेहरू जब लाल किले पर तिरंगा फहरा रहे थे, जब देश खुशियों और उम्मीदों में डूबा हुआ था। वहां होमाई मौजूद थीं और वह क्षण उनके कैमरे में हमेशा के लिए कैद हो गया। उन्होंने गांधी जी, जिन्ना, सरदार पटेल, नेहरू, इंदिरा गांधी, माउंटबेटन, और यहां तक कि जैकलीन कैनेडी जैसी बड़ी हस्तियों की तस्वीरें खींचीं। उनका फ्रेम सिर्फ तस्वीर नहीं होता था। उसमें भावनाएं, समय और इतिहास की धड़कन होती थी। 1956 में जब दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत आए, तब वो ऐतिहासिक क्षण भी उनके कैमरे ने ही दुनिया के सामने रखा।

एक महिला होने की चुनौतियाँ
उस दौर में ना तो महिला प्रेस कार्ड मिलते थे और ना कोई मानता था कि महिलाएं कठिन परिस्थितियों में काम कर सकती हैं। पर होमाई ने कभी समाज की बातों को बाधा नहीं बनने दिया। वे कहती थीं। “काम करते वक्त मैं सिर्फ फोटोग्राफर होती थी, महिला या पुरुष नहीं।” उनकी तस्वीरों में वही आत्मविश्वास दिखता है।
धीरे-धीरे दुनिया ने उन्हें पहचाना
लगभग 40 साल तक उन्होंने कैमरे के जरिए भारत के इतिहास को दर्ज किया। पर उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब 1970 में उनके पति का निधन हो गया। उस दुख ने उन्हें फोटोग्राफी से दूर कर दिया। उन्होंने कैमरा रख दिया, दिल्ली छोड़ी और गुजरात के वडोदरा में एक शांत जीवन जीने लगीं। कहते हैं, उनके हजारों नेगेटिव्स सालों तक एक ट्रंक में बंद पड़े रहे। जैसे इतिहास खुद इंतजार कर रहा था कि कोई उन्हें फिर से दुनिया के सामने लाए।
बाद की पहचान और सम्मान
- 90 के दशक में जब शोधकर्ताओं ने उनकी तस्वीरें खोजीं, तब दुनिया चकित रह गई, कि ये सब तस्वीरें एक महिला ने खींची हैं।
- 2010 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला और 2011 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
- 15 जनवरी 2012 को वे 98 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गईं।
होमाई व्यारावाला सिर्फ एक नाम नहीं हैं। वे वह दृष्टि हैं जिसने भारत को बदलते हुए देखा और उसे दुनिया के सामने रखने का साहस किया। आज की हर महिला फोटो जर्नलिस्ट, हर लड़की जो कैमरा उठाकर भीड़ में जाती है।