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अब ऑफिस के बाद कंपनी नहीं करवा सकती जबरदस्ती काम ! संसद में पेश हुआ ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ बिल

‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ बिल कैसे करता है काम और कितना आसान है इस बिल को संसद से पास करवाना

 

 

काम के बढ़ते बोझ के साथ भारत में वर्क लाइफ बैलेंस को लेकर बहस नई नहीं है। अक्सर तुलना  करके कहा जाता है कि विकसित देशों में 9 से 6 की शिफ्ट के बाद कर्मचारी पूरी तरह अपने निजी समय के मालिक होते हैं, जबकि भारत में दफ्तर का काम घर तक पीछा करता है। भारतीयों का काम ऑफिस के बाद भी चलते रहता है कॉल्स, ईमेल्स और वर्क-फ्रॉम-होम के दबाव के साथ।

इसी बढ़ते बोझ और मानसिक तनाव को देखते हुए लोकसभा में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ बिल पेश किया गया है, जिसमें साफ कहा गया है कि ऑफिस आवर्स खत्म होने के बाद कर्मचारी किसी भी कॉल, ईमेल या डिजिटल कम्युनिकेशन का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं होंगे।

 

किसने पेश किया बिल?

एनसीपी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले ने इसे लोकसभा में प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में पेश किया।महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सरकारी बिल नहीं है, इसलिए इसके पास होने के अवसर बेहद कम माने जा रहे हैं। जब बिल मंत्रियों की ओर से पेश किया जाता है तब इसे सरकारी बिल कहा जाता है सामान्य तौर पर इसके पास न होने की कोई संभावना नहीं होती है। क्योंकि सरकार द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन प्राइवेट मेम्बर बिल के पास होने के आसार काफी कम होते है। इसके लिए समर्थन जुटा पाना मुश्किल काम होता है।

 

बिल क्या कहता है?

1. कर्मचारियों का अधिकार

बिल में कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए है। ऑफिस के नियत घंटों के बाद कॉल, ईमेल, मैसेज, व्हॉट्सऐप या कंपनी के इंटरनल चैट को इग्नोर करने का कानूनी अधिकार। कर्मचारियों को इसके लिए किसी भी प्रकार की पेनल्टी, सैलरी कट, या किसी तरह से परेशान  नहीं किया जा सकता। साथ ही किसी भी कंपनी की यह जिम्मेदारी होगी की वो अपने एम्प्लॉईस को इसके लिए बाध्य नहीं करेगी ।

 

2. नियोक्ता की जिम्मेदारियाँ

हर कंपनी (10 से अधिक कर्मचारियों वाली) को कर्मचारियों के साथ वर्किंग आवर्स और ऑफ-आवर्स कम्युनिकेशन को लेकर लिखित एग्रीमेंट करना होगा।जिसमें  डिजिटल बाउंड्री सेटिंग अनिवार्य होगी। मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट, डिजिटल डिटॉक्स, काउंसलिंग और ट्रेनिंग देना भी शामिल होगा।

3. आफ्टर-आवर्स काम का भुगतान

यदि कर्मचारी ऑफिस आवर्स के बाद काम करने के लिए सहमत होता है, तो उसे ओवरटाइम रेट पर भुगतान जरूरी होगा।कंपनियों को उसका पूरा रिकॉर्ड रखना होगा।

4. निगरानी और शिकायत व्यवस्था

बिल में एम्प्लॉइज वेलफेयर अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव है, जो शिकायतें सुनेगी। कंपनियों का ऑडिट करेगी।  और कंपनी द्वारा नियमों का पालन न करने की दशा में पेनल्टी लगाएगी

 

भारत में इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

भारत में कोविड के पहले तक वर्क फ्रॉम होम का कल्चर नहीं था। कोविड के वक्त से ही हाइब्रिड और रिमोट कल्चर के कारण ‘ऑलवेज ऑन’ वर्क कल्चर बढ़ गया जिससे ऑफिस की तय समय सीमा नहीं रही। और कभी भी कार्य के लिए लोगों को तैयार रहना एक सामान्य प्रक्रिया बन गया ।  IT, BPO, बैंकिंग, कंसल्टिंग और स्टार्टअप सेक्टर में ऑफ-आवर्स कॉल्स और ईमेल्स आम हो गए।

लगातार डिजिटल कनेक्टिविटी से मानसिक थकान लोगों को परेशान कर रहा है ।  परिवार को मिलने वाला समय भी कम हो गया है। फ्रांस, स्पेन, इटली, आयरलैंड जैसे देश पहले ही इस कानून को लागू कर चुके हैं।

 

क्या है  चुनौतियाँ

यह बिल अगर पास होता है तो कर्मचारियों और कार्य संस्कृति दोनों पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। सबसे पहले इसके फायदों की बात करें तो वर्क लाइफ बैलेंस बेहतर होगा, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ेगा।

लेकिन इससे जुड़ी चुनौतियाँ भी काफी गंभीर हैं। सबसे बड़ी बाधा है कि यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है। भारत की संसदीय इतिहास को देखें तो 1952 से अब तक सिर्फ 14 प्राइवेट मेंबर बिल ही पास हुए हैं ।  इसलिए इस बिल के पास होने की संभावना बहुत कम मानी जा रही है। दूसरे, इंडस्ट्री की ओर से भी विरोध की उम्मीद है खासकर IT और स्टार्टअप सेक्टर में, जहाँ 24×7 ऑपरेशंस और अलग-अलग टाइम जोन की वजह से ऑफ-आवर्स कम्युनिकेशन कई बार अनिवार्य माना जाता है। तीसरी चुनौती है इसे कैसे लागू किया जाए ऑफ-आवर्स कॉल्स को ट्रैक करना, इमरजेंसी और नॉन-इमरजेंसी में फर्क करना, और छोटी कंपनियों की निगरानी करना आसान नहीं होगा। इससे पहले कॉंग्रेस  सांसद शशी थरूर भी कर्मचारियों के लिए एक निजी विधेयक पेश कर चुके है जिसमें कार्य के घंटे , विश्राम का वक्त समेत एम्प्लॉईस के वेयलफेर के लिए तमाम प्रावधान थे ।

 

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